अखिल भारतीय अधिकार संगठन के केंद्रीय ऑफिस में ज्यादा तर काम रत्रि १२ बजे तक चलता ही रहता है औत इसी लिए ज्यादा तर लोग अपनी समस्या भी बिना घडी देखे लेकर चले आते है पर मैं यह सोच कर उनका स्वागत करता हूँ क्योकि अगर उन्हें ज्यादा दर्द न होता तो वह इतनी रात में क्यों आकर आपको परेशां करते , खैर कल रात के करीब १०.५० हो चूका था और मैं अपना सारा काम समेत रहा था कि किसी ने बेल बजाई ...मैं खोला तो देखा एक जन ने वाले खड़े है और मुझे देखे ही बोले कि आपको डिस्टर्ब किया इसके लिए क्षमा पर मेरा मिलना जरुरी था इस लिए इस समय आया हूँ क्योकि आपसे दिन में मुलाकात हो ही नही पाती है | मैंने कहा कि कोई बात नही अखिल भारतीय अधिकार संगठन बना ही इसी लिए है कि जब आपको सब तरफ अँधेरा दिखाई दे तो आप उसकी तरफ आशा भरी नजरो से देखे और यह कहते हुए मैंने उन्हें अंदर बुलाया , बैठाया | पहले वह श्री अखिलेश यादव मुख्या मंत्री की बात करते रहे क्यों कि उन्हें पता है कि मैं उनको पसंद करता हूँ पर जब मैंने उन्हें टोक कर आने का कारण इतनी रात में पूछा तो बोले कि आप तो जानते ही है कि मेरी पत्नी भी सरकारी नौकरी में है और व अपने माँ के साथ रहती है क्योकि उसकी तबियत ठीक नही है और मेरे ससुराल वाले मानते है कि मई ठीक से इलाज नही करा पाउँगा ( इसी हस्तक्षेप के कारण ही कितनी शादिया टूटने के कगार पर है भारत में , पहले लड़की वाले शादी करते है फिर पानी लड़की के जीवन में इतना दखल कर देते है कि शादी का मतलब ही शुन्य हो जाता है ) पर मैंने कुछ नही कहा लेकिन अभी मुझे पता चला है कि मेरी पत्नी कि दोनों किडनी ख़राब (८०%) हो चुकी है और ख़राब हुई नही है बल्कि उनके यह का यह खानदानी रोग है जिसमे किडनी सिकुड़ जाती है और आदमी मर जाता है | उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी के पिता कि मृत्यु भी इसी कारण हुई थी | मेरे साले की भी किडनी एक है ही नही और दूसरी प्रभावित है | मई अपनी पत्नी से मिलना चाहता हूँ पर मिलने नही देते और मेरी एक छोटी सी बेटी है उस से भी नही मिलने नही देते | जब ससुराल जाता भी हूँ तो दरवाजे पर ही गली गलुज़ होने लगती है और मेरी सास यही चिल्लाती है की तुमने मेरी बेटी का जीवन बर्बाद कर दिया , उसे मार डाला जब की यह बीमारी उनके यह की खानदानी है और शादी से पहले उन लोगो ने मुझ से यह सा बात छिपाई बल्कि आज तक मुझे नही जानने नही दिया गया है की मेरी पत्नी का इलाज कौन और कहा पिछले ४ साल से कर रहा है ?????? यह कह कर वह चुप हो गए पर तुरंत ही बोले कि कही झूठे केस में तो नही फसा दिया जाऊंगा ???? क्या मै अपनी बेटी से नही मिल सकता ??????? क्या उन लोगो के खिलाफ कुछ हो सकता है जिन्होंने गलत शादी करके मेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी ?????????? मैं यूनकी साडी बात सुन कर पूछा कि आपकी पत्नी क्या कहती है ???? वह बोले कि वह तो नाराज होती है कि तुम सब लोग मेरे पाती को क्यों इतना भला बुरा कहते हो ????? मुझे तो लगता है कि मेरे ससुराल वाले मेरी पत्नी कि कमी पर नजर लगाये है क्यों कि मै तो कुछ लेता नही और वह लोग भी जानते है कि मेरी पत्नी मर जाएगी , इसी लिए वह अभी से प्लान कर रहे है कि किस तरह मुझे मरने के बाद कुछ न मिले और मेरी बेटी भी मुझे न मिले ?????????? मैंने कहा कि सब से पहले तो कोई बीमारी छिपा कर शादी होने की दशा में तलाक का प्राविधान है और जब आप की पाती आपकी तरफ है तो एक प्रार्थना पत्र पोलिस में दे दीजिये की ससुराल वाले मेरी पत्नी को बंधक बनाये है | यही नही आप रोज पत्नी से फ़ोन करके , मैसेज करके उनकी बीमारी का पूछा करिए | आप परेशां न हो आप एक रजिस्ट्री भेज कर उस डॉक्टर का नाम पता पूछिये जिस से आप की पत्नी का इलाज हो रहा है | इन सब से यह साबित कर सकते है की आप गलत नही थे बल्कि ससुराल वाले का व्यवहार ठीक नही था अपर यह भी यद् रखिये की आप जिस के लिए लड़ रहे है वह मरने के कगार पर है , उस से इस स्थिति में न तो तलाक लेना मानवीय कृत्य होगा और न ही झगडा करना | पर उन्होंने कहा की सब ठीक है पर अगर वह मर गई और मै फर्जी फस गया तो ?????? इस लिए मुझे अपना बचाव तो करना ही होगा | मैंने उन्हें एक प्रर्थन पत्र लिखने की सलाह दी जो पुलिस को भेजना था , मैसेज की सलाह दी पर इन सब के बीच यह भी समझाया की पत्नी की भावना इस दशा में आहत नही होनी चाहिए | मेरी बात और सलाह से वह काफी संतुष्ट हो गए और यह कहते हुए चले गए की अब वह काफी हल्का महसूस कर रहे है पर मै फिर भी यही सोच रहा था कि विवाह का सात जन्मो , स्वर्ग में जोड़ी बनती है , आदि साडी बाते इस देश में कहा खो गई अब तो सब शादी से ज्यादा इस बात के लिए परेशां है कि कही यह अनूठा रिश्ता उन्हें किसी परेशानी में फसा न दे और कानून के ज्ञान ने इस विवाह का जिस तरह सत्यानाश किया है उसमे एक पाती को अपनी मरती पत्नी से ज्यादा पाने को किसी केस में फसने से बचने कि चिंता ज्यादा दिखी और मरती पत्नी की माँ को भी अपनी बेटी से ज्यादा उसकी नौकरी का पैसा, अपनी नातिन पर अधिकार का नशा ज्यादा दिखा और इन सब के बीच इस देश में एक बीमार लड़की सिर्फ शादी के बाद भी मैयाके और ससुराल के झंझावातो के बीच मौत के इंतज़ार .................इसमें कौन सी संस्कृति दिखाई दे रही बताइयेगा जरुर .....डॉ आलोक चांत्टिया
Friday, 30 March 2012
Thursday, 29 March 2012
white clour crime
कहते है कि सामान्य आँखों से समाज में चल रहे अपराध दिखाई नही देता और आप उसे अपराध ख भी कैसे पाएंगे जब कि वह सब कुछ इस तरह किया जा रहाहो मानो आप ही की गलती के कारण आपका नुकसान हो रहा हो या फिर आप ही लापरवाह है | ऐसा ही कुछ मैंने अपने अध्ययन के लिए चुने गए लखनऊ विकास प्राधिकरण में पाया | एक आदमी इस लालच में कि एक दिन उसका भी माकन लखनऊ में सरकारी दरो पर होगा और वह वर्ष २००४ में एक योजना में आवेदन करता है और भाग्य वश उसका नाम भी आ जाता है | उसको हर तीन महीने पर करीब ५२००० रूपए की १० किश्त देनी थी और उसने देना शुरू किया जो फ़रवरी २००७ में पूरी हो गयी | अब बारी थी की वह आदमी अपने प्लाट का निबंधन कराके अपने लिए एक छोटा सा माकन बना ले क्यों की किराये से बेहतर है कि अपना मकान हो | जब भी उसने निबंधन के लिए बात की टी बताया गया कि अभी नही हो सकती क्यों कि कुछ तकनिकी मामला है पर इन सब में महंगाई और सभी चीजो के महंगे होने के कारण जो मकान उसको १ या २ लाख में बन सकता था वह वर्ष २०१२ तक में २० लाख में बनना मुश्किल हो गया पर यह हर्जाना कौन भरेगा , इस पर प्राधिकरण मौन है | कुछ निर्लज्ज अधिकारी और बाबु कह देते है कि आरे भाई जमीन भी तो महंगी हुई है पर उन अक्लमंदो से कौन कहे कि जिसे मकान बनाना है उसी जमीन पर , उसके लिखे लिए इस बात का क्या मतलब कि जमीन करोडो की हो गई है और यही नही इस बीच न जाने कितना किरय अमकन में लग गया वह अलग | खैर जन सुचना अधिकार अधिनियम जनता के लिए अमृत नही तो ओस की बूंद जरुर है जिस से कई बातो का खुलासा करना आसान होता है और यही हुआ इस तकनिकी से यह बात खुल कर सामने आई कि आज तक प्रदिकरण के पास जमीन ही नही थी और जब जमीन आ गई तो लीज प्लान नही बना था पर सूचना के कारण वह भी बन गया लेकिन इस बीच में २००७ से करीब ७ लाख रूपए पर ब्याज कितना हो गया यह आप खुद ही सोच ले यानि हर तरफ से उपभोक्ता का नुकसान चलता रहा और देरी के कारण निबंदहं पर लगने वाले स्टंप शुल्क का भी बोझ लगातार उपभोक्ता पर ही बढ़ता रहता है | यह सब चल ही रहा था कि एक सरकारी सूचना आई कि जिन लोगो ने आज तक ( यह नही लिखा गया कि सरकार की लापरवाही के कारण ) निबंधन नही कराया है वह लोग १ मार्च से ३१ मार्च के बीच निबंधन करा ले अन्यथा स्टंप शुल्क सिर्किल रेट पर लगेगा | शायद यह एक अच्छी खबर मानी जा सकती है और वह आदमी भी फिर दौड़ने लगा | पहले दल्लो ने यह कह कर कि जमीन बकवास है बिकवाने की कोशिश की पर अपनी पसीने की कमी भला कौन कौन बेचता है ?????वह से बच कर जब वह लिपिक महोदय के पास पंहुचा तो उन्होंने कहा कि होली के बाद आओ | उसे लगा कि भला आदमी मिल गया है काम हो जायेगा और उसने अपना मोबाइल नम्बर भी दे दिया कि आने कि कोई जरुरत नही है आप इसी से पूछ लीजियेगा | अब क्या था उसे भी लगा कि दुनिया अभी अच्छे लोगो से खाली नही हुई है और वह घर चला गया | होली आकर बीत गई पर जब भी व ह्फोने से पूछता एक ही जवाब मिलता ४ दिन बाद पूछियेगा और ऐसे करते करते २२ मार्च २०१२ आ गया अब उसके हाथ पैर फोलने लगे क्योकि ९ दिन ही ३१ मार्च में शेष थे और इसी लिए वह फिर सीधे उनसे मिला अपनी बात खी तो लिपिक महोदय ने फिर कहा परेशां क्यों है २६ तारिख को आपका काम देखूंगा | इस पर उसने कहा कि फिर निबंधन कब होगा तो वह हस कर कहने लगे कि यह आप जानो | उस आदमी को लगा कोइ वह किसी ऐसे गिरोह के साथ फसा है जो ऐसे ही बहकाते है पर उसका दिमाग काम कर गया उसने लौटे समय अपने मोबाइल से उन्ही लिपिक को साडी बातो का हवाला देते हुए एक मैसेज कर दिया और लिखा कि ३१ के बाद बढ़ी हुई रकम कौन अदा करेगा आप या फिर लखनऊ विकास प्राधिकरण ????????? कुछ ही देर में उनका फ़ोन आ गया कि आप ने मैसेज क्यों किया ??? उसने कहा कि जल्दी जायेंगे पर लिपिक ने कहा कि आप आइये आपका निबंधन होगा | वह फिर उनके पास पहुच गया और लिपिक ने फाइल निकाली और पूछना शुरू किया अंत में उसने कहा कि आपका प्लाट चुकी सड़क के किनारे है इस लिए आभी आपको ५३००० रूपए और जमा करने होंगे तो वह बोला कि आपने पहले क्यों नही बतया मानलीजिये किसी के पास इतने पैसे न ही तो ???????????? और फिर प्राधिकरण ने आज तक इसकी सूचना क्यों नही दी ????????क्या ये सब धांधली नही है ??????पर वह मोटी खाल का आदमी चुप रहा और कुछ देर बाद उस आदमी ने सारी जानकारी लेकर पैसा जमा करने कि बात खी तो लिपिक महोदय ने कहा कि आप ड्राफ्ट बनवा कर जमा कर दीजिये पर यह नही बताया कि ५०००० से ज्यादा कि रकम को पैन नंबर के साथ सीधे जमा किया जा सकता है और प्राधिकरण में उको बैंक की शाखा है भी | उस आदमी ने २७ मार्च को किसी तरह ड्राफ्ट बनवाया और फिर पहुचा तो लिपिक महोदय ने कहा कि जब ड्राफ्ट क्लेअर हो जाये गा तभी आपकी रजिस्ट्री हो सकती है , वह आदमी हताश हो गया अपर हरा नही उसने पूछा कितने दिन लगते है क्लेअर होने में तो उत्तर्मिला ३ दिन | आज २९ मार्च है अभी ड्राफ्ट क्लेअर नही है और ३० और ३१ को ही अंतिम कैंप लगना है उसके बाद कोई छूट नही | वह आदमी सचिव , अधिकरियो से मिला सब ने यही कहा कि जब पैसा प्राधिकार के अकाउंट में आ जायेगा तभी रजिस्ट्री होगी जबकि स्टेट बैंक से बने ड्राफ्ट को इस देश में क्यों संधिग्ध माना जा रहा है और किस स्तर का भर्ष्टाचार नकली ड्राफ्ट में भी आ गया है यह आसानी से समझा जा सकता है | उसने अधिकारिओ से कहा कि आपने अपने प्राधिकरण के बैंक के काउंटर पर क्यों नही लिखा रखा है कि ५०००० से ज्यादा कि रकम भी डिरेक्ट पैन नंबर के साथ जमा की जा सकती है पर इसका कोई सार्थक उत्तर देने के बजाये वह काम अधिक होने का बहाना करके बचते दिखाई देते है | यह है सफ़ेद पोश अपराध जिसमे लोग अपने पद के अनुरूप काम न करके जनता को ऐसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते है झा या तो वह घुस का सहारा ले या फिर अपनी सम्पति के आर्थिक नुकसान को नंगी आँखों से होता हुआ देखते रहे पर ऐसा नही है ड्राफ्ट बनवाने के समय एक बैंक कर्मी ने बताया था की परेशां होने की कोई जरुरत नही मेरे ( बैंक कर्मी ) तो सरे कागज ही खो गए थे और मैंने सिर्फ २५००० रुपये दिए और आराम से रजिस्ट्री हो गई थी \ पिछले वर्षो में प्राधिकरण के बाबुओ के पास से करोडो की सम्पति बरामद हुई है पर यह सम्पति कहा से आई यह कहने की कोई जरुरत है ऊपर लिखी सच्ची कहानी सुनने के बाद जहा आज तक रजिस्ट्री २००७ से अर्झी पड़ी है क्या यह कहने की जरुरत है की इस देश में अपराध कैसे होते है ?????और आप कह भी नही सकते वह अपराध है क्योकि प्रदर्शन ऐसा होगा मानो वह आप द्वारा अपने मन से किया गया लापरवाही पूर्ण कार्य हो जिसके कारण आपका काम न हो पाया हो >>>>>>>>>क्या आप इस तरह के श्वेत अपराध के बारे में कुछ कहना चाहेंगे ?????????? डॉ आलोक चान्त्टिया
aurat ka sach
अखिल भारतीय अधिकार संगठन ने लुअक्टा के साथ मिल कर महिला डिग्री कॉलेज लखनऊ के प्रबंधतंत्र को बर्खास्त करने का किया समर्थन
आज जब की भारत में हर तरफ महिला के सशक्ति करण की वकालत हो रही है और महिला को भी लग रहा है कि सरकार की नीतिया और संविधान के निति निदेशक तत्व उसको पुरुष से के बराबर लाने में विश्व के किसी अन्य देश से ज्यादा बेहतर प्रयास कर रहे है तब महिला डिग्री कॉलेज लखनऊ के प्रबंध तंत्र की तनाशी इन सरे दावो को कोरा साबित कर रही है | महिला का जिस तरह का उत्पीडन पुरुष प्रभावी प्रबंध तंत्र कर रहा है | उस से खी भी महिला के गरिमा पूर्ण स्थिति का आभास नही हो पा रहा है | महिला टीचर्स को उनकी छुट्टियो को देने में आना कानी की जाती है और सरकार द्वारा दी जाने वाली अधिकृत बाल्य लालन पालन के २ वर्षीय अवकाश को भी नही दिया जाता है | अखिल भारतीय अधिकार संगठन की महा मानती और लुअक्टा की वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ अंशु केडिया ने कहा की भारत में औरत का इतना अपमान उत्तर प्रदेश की राजधानी में राज्य सरकार के सामने हो रहा है और फिर भी सरकार प्रबंध तंत्र के खिलाफ कुछ नही कर रही है | इसका मतलब क्या लगाया जाये क्या औरत की गरिमा का ख्याल प्रदेश सरकार को भी नही है ?????? लुअक्टा के अध्यक्ष डॉ मनोज पांडे ने कहा कि संविधान के अनुरूप ही महिलाओ के साथ व्यवहार किया जाये और वह महिला शिक्षक है न कि नौकरी करने वाली एक वेतन भोगी कर्मचारी जिनका शोषण प्रबंध तंत्र जिस तरह से चाहे करे | उन्हों ने चेतावनी दी कि अगर महिलाओ को सामान्य प्रस्थिति में काम नही करने दिया गया तो आने वाले १५ अप्रैल से शिक्षक परीक्षाओ का बहिष्कार करेंगे | अखिल बहर्तिये अधिकार संगठन के अध्यक्ष डॉ आलोक चान्त्टिया ने कहा कि यह दुःख का विषय है कि प्रदेश की राजधानी में संविधान के अनुच्छेद १४ का उल्लंघन हो रहा है और सरकार सब कुछ देख रही है | प्रबंध तन्त्र ने यह साबित करने की कोशिश की है कि आज भी पुरुष के आगे महिला दोयम दर्जे की है जो एक असंवैधानिक कृत्य है | उन्होंने कहा कि सरकार की यह निति है कि महिला कॉलेज में पुरुष शिक्षक नियुक्त नही किया जा सकता और किया भी नही जाता पर किन नियमो के अंतर्गत प्रबंधतंत्र महिला कॉलेज में पुरुष का हो सकता है ??? जिन बिन्दुओ की शंका करके पुरुष टीचर के नियुक्ति पर रोक है वही संशय पुरुष प्रबंध तंत्र में भी तो है इस लिए तुरंत ऐसे प्रबंध तंत्र को भंग कर दिया जाना चाहिए और महिला प्रधान प्रबंध तंत्र बनाया जाना चाहिए | ताकि समानता की सही व्याख्या की जा सके | यह दुखद है कि आज धरने के समय कॉलेज का गेट पर ताला लगा दिया गया था | जब कि संविधान हम सब को शांति पूर्वक किसी भी आन्दोलन या बैठक की अनुमति देता है | पुलिस लगी थी मनो हम सब शिक्षक नही कोई अराजकता फ़ैलाने वाले असामजिक तत्व हो | महिला कॉलेज में महिलाये स्वयं चाहती है की सरकार का हस्तक्षेप हो , आज आन्दोलन में करीब १०० से ज्यादा शिक्शो ने भाग लिया | यही सही स्थिति है भारत में महिलाओ की | क्या आप इसे सही मानते है ????????????? डॉ आलोक चान्टिया
आज जब की भारत में हर तरफ महिला के सशक्ति करण की वकालत हो रही है और महिला को भी लग रहा है कि सरकार की नीतिया और संविधान के निति निदेशक तत्व उसको पुरुष से के बराबर लाने में विश्व के किसी अन्य देश से ज्यादा बेहतर प्रयास कर रहे है तब महिला डिग्री कॉलेज लखनऊ के प्रबंध तंत्र की तनाशी इन सरे दावो को कोरा साबित कर रही है | महिला का जिस तरह का उत्पीडन पुरुष प्रभावी प्रबंध तंत्र कर रहा है | उस से खी भी महिला के गरिमा पूर्ण स्थिति का आभास नही हो पा रहा है | महिला टीचर्स को उनकी छुट्टियो को देने में आना कानी की जाती है और सरकार द्वारा दी जाने वाली अधिकृत बाल्य लालन पालन के २ वर्षीय अवकाश को भी नही दिया जाता है | अखिल भारतीय अधिकार संगठन की महा मानती और लुअक्टा की वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ अंशु केडिया ने कहा की भारत में औरत का इतना अपमान उत्तर प्रदेश की राजधानी में राज्य सरकार के सामने हो रहा है और फिर भी सरकार प्रबंध तंत्र के खिलाफ कुछ नही कर रही है | इसका मतलब क्या लगाया जाये क्या औरत की गरिमा का ख्याल प्रदेश सरकार को भी नही है ?????? लुअक्टा के अध्यक्ष डॉ मनोज पांडे ने कहा कि संविधान के अनुरूप ही महिलाओ के साथ व्यवहार किया जाये और वह महिला शिक्षक है न कि नौकरी करने वाली एक वेतन भोगी कर्मचारी जिनका शोषण प्रबंध तंत्र जिस तरह से चाहे करे | उन्हों ने चेतावनी दी कि अगर महिलाओ को सामान्य प्रस्थिति में काम नही करने दिया गया तो आने वाले १५ अप्रैल से शिक्षक परीक्षाओ का बहिष्कार करेंगे | अखिल बहर्तिये अधिकार संगठन के अध्यक्ष डॉ आलोक चान्त्टिया ने कहा कि यह दुःख का विषय है कि प्रदेश की राजधानी में संविधान के अनुच्छेद १४ का उल्लंघन हो रहा है और सरकार सब कुछ देख रही है | प्रबंध तन्त्र ने यह साबित करने की कोशिश की है कि आज भी पुरुष के आगे महिला दोयम दर्जे की है जो एक असंवैधानिक कृत्य है | उन्होंने कहा कि सरकार की यह निति है कि महिला कॉलेज में पुरुष शिक्षक नियुक्त नही किया जा सकता और किया भी नही जाता पर किन नियमो के अंतर्गत प्रबंधतंत्र महिला कॉलेज में पुरुष का हो सकता है ??? जिन बिन्दुओ की शंका करके पुरुष टीचर के नियुक्ति पर रोक है वही संशय पुरुष प्रबंध तंत्र में भी तो है इस लिए तुरंत ऐसे प्रबंध तंत्र को भंग कर दिया जाना चाहिए और महिला प्रधान प्रबंध तंत्र बनाया जाना चाहिए | ताकि समानता की सही व्याख्या की जा सके | यह दुखद है कि आज धरने के समय कॉलेज का गेट पर ताला लगा दिया गया था | जब कि संविधान हम सब को शांति पूर्वक किसी भी आन्दोलन या बैठक की अनुमति देता है | पुलिस लगी थी मनो हम सब शिक्षक नही कोई अराजकता फ़ैलाने वाले असामजिक तत्व हो | महिला कॉलेज में महिलाये स्वयं चाहती है की सरकार का हस्तक्षेप हो , आज आन्दोलन में करीब १०० से ज्यादा शिक्शो ने भाग लिया | यही सही स्थिति है भारत में महिलाओ की | क्या आप इसे सही मानते है ????????????? डॉ आलोक चान्टिया
Wednesday, 28 March 2012
Anna OR Balwant singh ????????????? Indian ?????????
अन्ना हजारे और बलवंत सिंह ?????????????????????????????? कौन भारतीय ज्यादा !!!!!!
आज और कल में फर्क इतना है कि कल संसद में अन्ना के लिए चीख पुकार मची थी और आज बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह के फांसी पर पंजाब सहित पूरा देश चिल्ला रहा था पर यक्ष प्रश्न यही है कि असली भारतीय कौन है ?????????????? अन्ना या बलवंत या फिर एक आम आदमी ज्यादा भारतीय ज्यादा है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! अन्ना एक ऐसा नाम जो पिछले एक साल में भ्रष्टाचार के खिलाफ हर लड़ने वाले के लिए एक ब्रांड है जिस के सहारे पूरा देश यह बताने में जुटा दिखाई देता है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है पर सच क्या यही है ?????? अन्ना जानते है कि पढाना एक टीचर का फर्ज है पर विश्वास से उन्होंने कभी नही पूछा कि तुम्हारे कॉलेज के लड़के कहते है कि तुम पढ़ाते नही फिर देश का दर्द तुम क्या समझोगे ??????????????? यही नही उन्होंने कभी नही खा कि केजरीवाल तुम सरकार का पैसा रोक कर गलत कर रहे थे फिर तुम्हरे और टैक्स चुराने वालो में फर्क क्या है और तुम क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हो ????????????तुम लखनऊ जाकर सिर्फ वातानुकूलित कमरों में बैठते हो तुम कैसे जन पाओगे कि एक किसान का दर्द क्या है ?????????? और किरण बेदी से कभी नही कहा कि एक ही यात्रा के लिए दो दो पैसा लेकर और उच्चा श्रेणी का किराया लेकर निम्न श्रेणी में यात्रा करना भी धोखाधडी ही है तो तू उस धोखे बाज से कैसे बेहतर हो जो देश में धोखा देकर चूना लगा रहा है ?????????? उन्हों ने खुद से नही पूछा कि गाँधी कि तरह वह सेकेंड क्लास में सफ़र क्यों नही कर सके ...उन्होंने हमेशा हवाई जहाज़ से सफ़र किया पर गाँधी कि तरह साधारण क्लास में सफ़र करके हर स्टेशन पर क्यों नही देश कि जनता से मिले ???????उन्हों ने कभी आम जनता के पत्रों का जवाब दिया ??उन्हों ने अपने आलवा कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ बैठने वाले अनशन करिओ को तरजीह दी ऐसा लगता है जैसे गलत तरीके से रमन मग्सेसे पुरस्काए पाए लोगो ने यह निशित किया कि भरष्टाचार की बात करके क्यों न अन्ना को भी यह पुरुस्कार दिला दिया जाये और इसके लिए सिर्फ देश की जनता को समय समय पर उकसाया गया | उकसाना शब्द इस लिए ख रहा हूँ क्यों की उन्होंने अनशन करिओ को कभी गंभीरता से नही लिया और न ही गलत दवाओ और चोरी की चादर के प्रकरण में उन्होंने कोई बोलने की जरुरत समझी| यानि सिर्फ अपने को उठाने का एक प्रयास और अगर आपको ऐसा न लगे तो बताइए की जब देश के ५ राज्यों में चुनाव हो रहे थे तो उन्होंने क्यों नही देश की जनता से कहा कि इस बार देश कि हर विधान सभा को इमानदारो से भर दो | उनको देश ने इतना समर्थन और सम्मान दिया था कि पूरा देश उन्हें यह भी करके दिखा देता पर उस समय यही दिखाने में पूरा समय बीता कि वह बीमार है , चल नही सकते पर लकवा तो नही मार गया था | जिस मीडिया ने उन्हें इतना स्थान दिया वह बीमार अन्ना की अपील भी दिखा देता और बीमार अन्ना की अपील जादू सा असर करती और देश का भविष्य सुधर जाता पर वह तब तक बीमार बने रहे जब तक चुनाव समाप्त नही हो गया और अब वह पूरी तरह ठीक है | क्या यह सिर्फ इतेफाक है ??????? और जब देश को बदलने का विकल्प शुन्य ( चुनाव और मत ) कीस्थिति में है तो वह फिर देश को समझने की कोशिश कर रहे है कि देश के नेता चोर है , भ्रष्टाचारी है | क्या यह सिर्फ गलत समय पर देश के लोगो कि कोमल भवन अको उकसाने का प्रयास नही है ?????? क्या भूमंडली करण के समय गांधीवाद को बाजारीकरण कि वास्तु बना कर गाँधी को बेचने का प्रयास भर नही है अन्ना का प्रयास ??????अगर ऐसा नही तो उन्होंने सही समय पर सही बात क्या नही उठाई ????????????? अन्ना जन गए कि इस देश में भावना उकसा कर कैसे अपने को महान बनाया जा सकता है | इस शोर गुल से इतर देश में इस लिए भी शोर मचाया जा रहा है कि बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह को क्यों फांसी दी जा रही है जब कि उच्चतम न्यायलय का आदेश आना शेष है और संविधान के अनुच्छेद ७२ के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमा याचना आना भी शेष है पर यह भी जनन होगा कि ०१ अगस्त २००७ से एक आदमी जिन्दा जो मर जाना चाहिए था मैंने राष्ट्रपति जी के यह से सुचना भी मांगी कि आखिर कब तक हत्यारों को जिन्दा रख कर देश का पैसा और जनता से पैसा का दुरपयोग करने का प्राविधान है पर आज तक उसका उत्तर नही दिया गया है ?????????? जिस देश में हत्या करने के बाद कोर्ट और राष्ट्रपति की क्षमा याचना के प्राविधान के सहारे एक अपराधी २० २० साल जिन्दा रह सकता हो तो उस देश में अपराध बढ़ना स्वाभाविक है और आम जनता में यह सन्देश जा रहा है कि देश में अपराधियों को ज्यादा संरक्षण है और इसी लिए उन्हें किसी तरह जिन्दा रहने के लिए कम करना चाहिय क्योकि न्याय के नाम पर एक अपराधी तो वर्षो जिन्दा रह सकता है पर जिस का घर उजाड़ गया उसके लिए न्याय क्या हो , इस के लिए देस मौन है और यही कारण है कि विगर में अपराध बढ़ा है और लोगो में डर बढ़ा है और इसने ने भर्ष्टाचार को बढ़ाने में भी मदद की है \ इस लिए गलत करने वालो को तुरंत फांसी हो और यही कानून हर जगह मान्य होना चहिये क्यों कि एक तरफ देश की जनता को इस लिए उकसाया जा रहा है कि भर्ष्टाचार है और दूसरी तरफ एक हत्यारे को बचाने के लिए यह कहकर उकसाया जा रहा है कि देश में कानून का मतलब नही है जब कि देश कि सामान्य जनता को उकसाने के लिए दोनों को देश का गुनाहगार माना जाना चाहिए और जनता को स्वयं एक साफ़ सुथरा देश बनाना चाहिए न कि उन लोगो के साथ जाना चाहिए जो फिर से देश को बाटना चाहते है और सिर्फ इनाम, सम्मान पाने के लिए देश को गलत तरीके से गलत समय पर भटकाते है ..आप भी उतने ही संवेदन शील भारतीय है जितना वो अपने को कहकर भर्ष्टाचार करने वालो के साथ मिल कर देश से भर्ष्टाचार मिटने कि बात करते है ...........सोचिये और कुछ कहिये जरुर ........डॉ आलोक चांत्टिया
आज और कल में फर्क इतना है कि कल संसद में अन्ना के लिए चीख पुकार मची थी और आज बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह के फांसी पर पंजाब सहित पूरा देश चिल्ला रहा था पर यक्ष प्रश्न यही है कि असली भारतीय कौन है ?????????????? अन्ना या बलवंत या फिर एक आम आदमी ज्यादा भारतीय ज्यादा है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! अन्ना एक ऐसा नाम जो पिछले एक साल में भ्रष्टाचार के खिलाफ हर लड़ने वाले के लिए एक ब्रांड है जिस के सहारे पूरा देश यह बताने में जुटा दिखाई देता है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है पर सच क्या यही है ?????? अन्ना जानते है कि पढाना एक टीचर का फर्ज है पर विश्वास से उन्होंने कभी नही पूछा कि तुम्हारे कॉलेज के लड़के कहते है कि तुम पढ़ाते नही फिर देश का दर्द तुम क्या समझोगे ??????????????? यही नही उन्होंने कभी नही खा कि केजरीवाल तुम सरकार का पैसा रोक कर गलत कर रहे थे फिर तुम्हरे और टैक्स चुराने वालो में फर्क क्या है और तुम क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हो ????????????तुम लखनऊ जाकर सिर्फ वातानुकूलित कमरों में बैठते हो तुम कैसे जन पाओगे कि एक किसान का दर्द क्या है ?????????? और किरण बेदी से कभी नही कहा कि एक ही यात्रा के लिए दो दो पैसा लेकर और उच्चा श्रेणी का किराया लेकर निम्न श्रेणी में यात्रा करना भी धोखाधडी ही है तो तू उस धोखे बाज से कैसे बेहतर हो जो देश में धोखा देकर चूना लगा रहा है ?????????? उन्हों ने खुद से नही पूछा कि गाँधी कि तरह वह सेकेंड क्लास में सफ़र क्यों नही कर सके ...उन्होंने हमेशा हवाई जहाज़ से सफ़र किया पर गाँधी कि तरह साधारण क्लास में सफ़र करके हर स्टेशन पर क्यों नही देश कि जनता से मिले ???????उन्हों ने कभी आम जनता के पत्रों का जवाब दिया ??उन्हों ने अपने आलवा कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ बैठने वाले अनशन करिओ को तरजीह दी ऐसा लगता है जैसे गलत तरीके से रमन मग्सेसे पुरस्काए पाए लोगो ने यह निशित किया कि भरष्टाचार की बात करके क्यों न अन्ना को भी यह पुरुस्कार दिला दिया जाये और इसके लिए सिर्फ देश की जनता को समय समय पर उकसाया गया | उकसाना शब्द इस लिए ख रहा हूँ क्यों की उन्होंने अनशन करिओ को कभी गंभीरता से नही लिया और न ही गलत दवाओ और चोरी की चादर के प्रकरण में उन्होंने कोई बोलने की जरुरत समझी| यानि सिर्फ अपने को उठाने का एक प्रयास और अगर आपको ऐसा न लगे तो बताइए की जब देश के ५ राज्यों में चुनाव हो रहे थे तो उन्होंने क्यों नही देश की जनता से कहा कि इस बार देश कि हर विधान सभा को इमानदारो से भर दो | उनको देश ने इतना समर्थन और सम्मान दिया था कि पूरा देश उन्हें यह भी करके दिखा देता पर उस समय यही दिखाने में पूरा समय बीता कि वह बीमार है , चल नही सकते पर लकवा तो नही मार गया था | जिस मीडिया ने उन्हें इतना स्थान दिया वह बीमार अन्ना की अपील भी दिखा देता और बीमार अन्ना की अपील जादू सा असर करती और देश का भविष्य सुधर जाता पर वह तब तक बीमार बने रहे जब तक चुनाव समाप्त नही हो गया और अब वह पूरी तरह ठीक है | क्या यह सिर्फ इतेफाक है ??????? और जब देश को बदलने का विकल्प शुन्य ( चुनाव और मत ) कीस्थिति में है तो वह फिर देश को समझने की कोशिश कर रहे है कि देश के नेता चोर है , भ्रष्टाचारी है | क्या यह सिर्फ गलत समय पर देश के लोगो कि कोमल भवन अको उकसाने का प्रयास नही है ?????? क्या भूमंडली करण के समय गांधीवाद को बाजारीकरण कि वास्तु बना कर गाँधी को बेचने का प्रयास भर नही है अन्ना का प्रयास ??????अगर ऐसा नही तो उन्होंने सही समय पर सही बात क्या नही उठाई ????????????? अन्ना जन गए कि इस देश में भावना उकसा कर कैसे अपने को महान बनाया जा सकता है | इस शोर गुल से इतर देश में इस लिए भी शोर मचाया जा रहा है कि बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह को क्यों फांसी दी जा रही है जब कि उच्चतम न्यायलय का आदेश आना शेष है और संविधान के अनुच्छेद ७२ के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमा याचना आना भी शेष है पर यह भी जनन होगा कि ०१ अगस्त २००७ से एक आदमी जिन्दा जो मर जाना चाहिए था मैंने राष्ट्रपति जी के यह से सुचना भी मांगी कि आखिर कब तक हत्यारों को जिन्दा रख कर देश का पैसा और जनता से पैसा का दुरपयोग करने का प्राविधान है पर आज तक उसका उत्तर नही दिया गया है ?????????? जिस देश में हत्या करने के बाद कोर्ट और राष्ट्रपति की क्षमा याचना के प्राविधान के सहारे एक अपराधी २० २० साल जिन्दा रह सकता हो तो उस देश में अपराध बढ़ना स्वाभाविक है और आम जनता में यह सन्देश जा रहा है कि देश में अपराधियों को ज्यादा संरक्षण है और इसी लिए उन्हें किसी तरह जिन्दा रहने के लिए कम करना चाहिय क्योकि न्याय के नाम पर एक अपराधी तो वर्षो जिन्दा रह सकता है पर जिस का घर उजाड़ गया उसके लिए न्याय क्या हो , इस के लिए देस मौन है और यही कारण है कि विगर में अपराध बढ़ा है और लोगो में डर बढ़ा है और इसने ने भर्ष्टाचार को बढ़ाने में भी मदद की है \ इस लिए गलत करने वालो को तुरंत फांसी हो और यही कानून हर जगह मान्य होना चहिये क्यों कि एक तरफ देश की जनता को इस लिए उकसाया जा रहा है कि भर्ष्टाचार है और दूसरी तरफ एक हत्यारे को बचाने के लिए यह कहकर उकसाया जा रहा है कि देश में कानून का मतलब नही है जब कि देश कि सामान्य जनता को उकसाने के लिए दोनों को देश का गुनाहगार माना जाना चाहिए और जनता को स्वयं एक साफ़ सुथरा देश बनाना चाहिए न कि उन लोगो के साथ जाना चाहिए जो फिर से देश को बाटना चाहते है और सिर्फ इनाम, सम्मान पाने के लिए देश को गलत तरीके से गलत समय पर भटकाते है ..आप भी उतने ही संवेदन शील भारतीय है जितना वो अपने को कहकर भर्ष्टाचार करने वालो के साथ मिल कर देश से भर्ष्टाचार मिटने कि बात करते है ...........सोचिये और कुछ कहिये जरुर ........डॉ आलोक चांत्टिया
kyaisa jivan ka sach
आज मै एक ऐसी बात महसूस कर रहा हूँ जो आप से बाटना चाहता हूँ क्योकि अखिल भारतीय अधिकार संगठन का उद्देश्य भी यही है कि समाज को संवेदन शील बनाया जाये ...कल रात कर्रें १०.१५ पर मेरे सबसे प्रिये विद्द्यार्थी का फ़ोन आया कि सर मेरी माँ का देहांत हो गया है और मुझे भी लगा कि माँ का देहांत हो जाना चाहिए था क्यों कि जिस तरह वह कैंसर से पीड़ित थी उसमे मौत से बेहतर कोई विकल हो ही नही सकता पर मनुष्य ने संस्कृति बना कर जो नातेदारी और मनुष्यता का बीजा रोपण किया वह किसी भी मनुष्य को ऐसे मरते नही देख सकता और जब भी ऐसी कोई बात आती है तो अपवाद को यदि छोड़ दिया जाये तो मनुष्य धन से ज्यादा अपनों को जिन्दा रखने को तरजीह देता है भले ही वह जनता हो कि उस बीमारी का कोई इलाज नही है और एक दिन उसे मरना ही है पर वह दह बहाना श्र्येश्कर समझता है और यही पर धन और रिश्ते के बीच का फर्क पता चलता है और यही मेरे पुत्र जैसे विद्द्यार्थी कि माँ के साथ हो रहा था ..पूरा घर आर्थिक परेशानियो से जूझ रहा था ..कर्ज कि मार से भी नही बच प् रहे थे पर सभी एक निशित परिणाम को जानने के बाद भी अपना सब कुछ लुटा देना चाहते थे और लुटाया | कल रात जब मुझे यह सुचना मिली तो मुझे दुःख जरुर हुआ पर वह दुःख एक माँ के जाने का अधिक था क्यों कि इस शब्द माँ कोअ कोई विकल्प मै इस दुनिया में नही पाता हूँ | खैर आज उनका अंतिम संस्कार हो गया मै फिर भी नही गया क्यों कि मै माँ को जलते नही देख सकता | करीब आज ३ बजे मैंने पाने पुत्र को फ़ोन किया और पूछा तो उसने बताया कि माँ का अंतिम संस्कार पंचग्नि देकर कर दिया गया है | मैंने पूछा ये क्या है ? तो बोला कि सर मेरी और पापा दोनों कि तबियत ( शुगर ) के कारण इतनी ख़राब है कि हम दोनों लोग क्रिया पर बैठ नही सकते और जब तक सनातन धर्म से सब कुछ होगा तो हमारी चचेरी बहन कि शादी की तिथि आ जाएगी और ऐसे कामो के बाद या बीच में शादी ठीक नही इस लिए माँ के देहांत के बाद की साडी क्रियाये अब शादी के बाद होंगी | मै साडी बात सुन कर हैरान था क्यों की मन यह सोच रहा था कि माँ जब तक जिन्दा थी तब तक इस घर अपना सब कुछ लुटा दिया पर जब माँ ( मनुष्य ) मर गई तो इन लोगो ने उस लड़की की शादी को तरजीह दी जो माँ की क्रिया के कारण बाधित हो सकती थी | तो क्या निष्कर्ष यह निकला की जिन्दा मनुष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है?????????? ? या फिर संस्कृति में गतिशीलता को बाधित होने नही दिया जाता ?????????? या फिर संस्कृति का मतलब ही जिन्दा व्यक्तियों का क्रिया कलाप है ???????? माँ , बहन या कोई और मनुष्य का नाम महतवपूर्ण है या फिर एक मनुष्य को जिन्दा रखने का नम्म ही संस्कृति है ???????????? मनुष्य के जीवन में ख़ुशी के काम मृत्यु के काम से ज्यादा महत्व पूर्ण क्यों माने गए जब की व शरीर देवत्व को प्राप्त हुआ ?????ऐसे ही कई उलझनों के बीच मुझे लगा कि क्यों न आप से बात करके देखू कि आप क्या कहते है ?????अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप को सुनना चाहता है .....डॉ आलोक चांत्टिया
kya sach hai ???????????????
आज मै एक ऐसी बात महसूस कर रहा हूँ जो आप से बाटना चाहता हूँ क्योकि अखिल भारतीय अधिकार संगठन का उद्देश्य भी यही है कि समाज को संवेदन शील बनाया जाये ...कल रात कर्रें १०.१५ पर मेरे सबसे प्रिये विद्द्यार्थी का फ़ोन आया कि सर मेरी माँ का देहांत हो गया है और मुझे भी लगा कि माँ का देहांत हो जाना चाहिए था क्यों कि जिस तरह वह कैंसर से पीड़ित थी उसमे मौत से बेहतर कोई विकल हो ही नही सकता पर मनुष्य ने संस्कृति बना कर जो नातेदारी और मनुष्यता का बीजा रोपण किया वह किसी भी मनुष्य को ऐसे मरते नही देख सकता और जब भी ऐसी कोई बात आती है तो अपवाद को यदि छोड़ दिया जाये तो मनुष्य धन से ज्यादा अपनों को जिन्दा रखने को तरजीह देता है भले ही वह जनता हो कि उस बीमारी का कोई इलाज नही है और एक दिन उसे मरना ही है पर वह दह बहाना श्र्येश्कर समझता है और यही पर धन और रिश्ते के बीच का फर्क पता चलता है और यही मेरे पुत्र जैसे विद्द्यार्थी कि माँ के साथ हो रहा था ..पूरा घर आर्थिक परेशानियो से जूझ रहा था ..कर्ज कि मार से भी नही बच प् रहे थे पर सभी एक निशित परिणाम को जानने के बाद भी अपना सब कुछ लुटा देना चाहते थे और लुटाया | कल रात जब मुझे यह सुचना मिली तो मुझे दुःख जरुर हुआ पर वह दुःख एक माँ के जाने का अधिक था क्यों कि इस शब्द माँ कोअ कोई विकल्प मै इस दुनिया में नही पाता हूँ | खैर आज उनका अंतिम संस्कार हो गया मै फिर भी नही गया क्यों कि मै माँ को जलते नही देख सकता | करीब आज ३ बजे मैंने पाने पुत्र को फ़ोन किया और पूछा तो उसने बताया कि माँ का अंतिम संस्कार पंचग्नि देकर कर दिया गया है | मैंने पूछा ये क्या है ? तो बोला कि सर मेरी और पापा दोनों कि तबियत ( शुगर ) के कारण इतनी ख़राब है कि हम दोनों लोग क्रिया पर बैठ नही सकते और जब तक सनातन धर्म से सब कुछ होगा तो हमारी चचेरी बहन कि शादी की तिथि आ जाएगी और ऐसे कामो के बाद या बीच में शादी ठीक नही इस लिए माँ के देहांत के बाद की साडी क्रियाये अब शादी के बाद होंगी | मै साडी बात सुन कर हैरान था क्यों की मन यह सोच रहा था कि माँ जब तक जिन्दा थी तब तक इस घर अपना सब कुछ लुटा दिया पर जब माँ ( मनुष्य ) मर गई तो इन लोगो ने उस लड़की की शादी को तरजीह दी जो माँ की क्रिया के कारण बाधित हो सकती थी | तो क्या निष्कर्ष यह निकला की जिन्दा मनुष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है?????????? ? या फिर संस्कृति में गतिशीलता को बाधित होने नही दिया जाता ?????????? या फिर संस्कृति का मतलब ही जिन्दा व्यक्तियों का क्रिया कलाप है ???????? माँ , बहन या कोई और मनुष्य का नाम महतवपूर्ण है या फिर एक मनुष्य को जिन्दा रखने का नम्म ही संस्कृति है ???????????? मनुष्य के जीवन में ख़ुशी के काम मृत्यु के काम से ज्यादा महत्व पूर्ण क्यों माने गए जब की व शरीर देवत्व को प्राप्त हुआ ?????ऐसे ही कई उलझनों के बीच मुझे लगा कि क्यों न आप से बात करके देखू कि आप क्या कहते है ?????अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप को सुनना चाहता है .....डॉ आलोक चांत्टिया
Cuture??????????????????
आज मै एक ऐसी बात महसूस कर रहा हूँ जो आप से बाटना चाहता हूँ क्योकि अखिल भारतीय अधिकार संगठन का उद्देश्य भी यही है कि समाज को संवेदन शील बनाया जाये ...कल रात कर्रें १०.१५ पर मेरे सबसे प्रिये विद्द्यार्थी का फ़ोन आया कि सर मेरी माँ का देहांत हो गया है और मुझे भी लगा कि माँ का देहांत हो जाना चाहिए था क्यों कि जिस तरह वह कैंसर से पीड़ित थी उसमे मौत से बेहतर कोई विकल हो ही नही सकता पर मनुष्य ने संस्कृति बना कर जो नातेदारी और मनुष्यता का बीजा रोपण किया वह किसी भी मनुष्य को ऐसे मरते नही देख सकता और जब भी ऐसी कोई बात आती है तो अपवाद को यदि छोड़ दिया जाये तो मनुष्य धन से ज्यादा अपनों को जिन्दा रखने को तरजीह देता है भले ही वह जनता हो कि उस बीमारी का कोई इलाज नही है और एक दिन उसे मरना ही है पर वह दह बहाना श्र्येश्कर समझता है और यही पर धन और रिश्ते के बीच का फर्क पता चलता है और यही मेरे पुत्र जैसे विद्द्यार्थी कि माँ के साथ हो रहा था ..पूरा घर आर्थिक परेशानियो से जूझ रहा था ..कर्ज कि मार से भी नही बच प् रहे थे पर सभी एक निशित परिणाम को जानने के बाद भी अपना सब कुछ लुटा देना चाहते थे और लुटाया | कल रात जब मुझे यह सुचना मिली तो मुझे दुःख जरुर हुआ पर वह दुःख एक माँ के जाने का अधिक था क्यों कि इस शब्द माँ कोअ कोई विकल्प मै इस दुनिया में नही पाता हूँ | खैर आज उनका अंतिम संस्कार हो गया मै फिर भी नही गया क्यों कि मै माँ को जलते नही देख सकता | करीब आज ३ बजे मैंने पाने पुत्र को फ़ोन किया और पूछा तो उसने बताया कि माँ का अंतिम संस्कार पंचग्नि देकर कर दिया गया है | मैंने पूछा ये क्या है ? तो बोला कि सर मेरी और पापा दोनों कि तबियत ( शुगर ) के कारण इतनी ख़राब है कि हम दोनों लोग क्रिया पर बैठ नही सकते और जब तक सनातन धर्म से सब कुछ होगा तो हमारी चचेरी बहन कि शादी की तिथि आ जाएगी और ऐसे कामो के बाद या बीच में शादी ठीक नही इस लिए माँ के देहांत के बाद की साडी क्रियाये अब शादी के बाद होंगी | मै साडी बात सुन कर हैरान था क्यों की मन यह सोच रहा था कि माँ जब तक जिन्दा थी तब तक इस घर अपना सब कुछ लुटा दिया पर जब माँ ( मनुष्य ) मर गई तो इन लोगो ने उस लड़की की शादी को तरजीह दी जो माँ की क्रिया के कारण बाधित हो सकती थी | तो क्या निष्कर्ष यह निकला की जिन्दा मनुष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है?????????? ? या फिर संस्कृति में गतिशीलता को बाधित होने नही दिया जाता ?????????? या फिर संस्कृति का मतलब ही जिन्दा व्यक्तियों का क्रिया कलाप है ???????? माँ , बहन या कोई और मनुष्य का नाम महतवपूर्ण है या फिर एक मनुष्य को जिन्दा रखने का नम्म ही संस्कृति है ???????????? मनुष्य के जीवन में ख़ुशी के काम मृत्यु के काम से ज्यादा महत्व पूर्ण क्यों माने गए जब की व शरीर देवत्व को प्राप्त हुआ ?????ऐसे ही कई उलझनों के बीच मुझे लगा कि क्यों न आप से बात करके देखू कि आप क्या कहते है ?????अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप को सुनना चाहता है .....डॉ आलोक चांत्टिया
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