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Saturday, 14 May 2011

कानपूर विश्वविद्यालय का निजी महाविद्यालय को मान्यता देने का गोरख धंधा

आज शिक्षा माफ़िया में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से संबध करके निजी महाविद्यालय को खोलने की होड़ लगी हुयी है तथा अनेक शिक्षा माफिया अपनी स्नातक और परास्नातक तथा बी एड और एम् एड की मान्यता को स्थायी करवाने में लगे हुए है.एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष १०० से अधिक निजी महाविद्यालय की शिक्षा की नयी दुकाने इस विश्वविद्यालय से इस साल जुड़ने वाली है.इस साल विश्वविद्यालय के जो कर्मचारी मान्यता देने की इस प्रक्रिया में शामिल है उन को लाखो रुपये की काली कमाई हो रही है.मान्यता देने की इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय के कर्मचारी महाविद्यालय के मानक कम और नोटों की गद्दिया ज्यादा देखते है.इन कर्मचारियों का असल में महाविद्यालय से कोई लेना देना होता ही नहीं है लगर लेना होता है तो वो होता है रिश्वत से.कौन महाविद्यालय कितनी अधिक रिश्वत दे रहा है बस इस बात से मतलाब होता है क्योकि विश्वविद्यालय के कर्मचारी भली भाति जानते है के इन निजी महाविद्यालय में न तो इनके बच्चे पढेगे और नहीं इनके रिश्तेदार पढेगे अगर एसा होता भी है तो फिर इन निजी महाविद्यालय में इनके लिए अलग से कॉपी लिखने की व्यवथा हो जाएगी.आज इस विश्वविद्यालय से संबध शायद ही कोई निजी महाविद्यालय होगा जिसके पुरे मानक हो.अरे पुरे मानक तो छोडो आधे मानक ही हो.फिर भी विश्वविद्यालय मान्यता देने में लगा हुआ है क्यों की विश्वविद्यालय के कर्मचारी रिश्वत ले कर कागजो में मानक पुरे कर देते है.इस वर्ष अनेक महाविद्यालय को स्थायी मान्यता दी जा रही है और वो भी इस शर्त पर की इसके बदले नोटों की मोती गद्दी चाहिए.हैरान कर देने वाली बात तब होती है जब महाविद्यालय ३ साल शिक्षण कार्य कर चुकाने के बाद भी उसके मानक पुरे नहीं होते है फिर भी विश्वविद्यालय उसे स्थायी मान्यता दे रहा है वो भी केवल नोटों के दम पर.विश्वविद्यालय के कर्मचारी स्थायी मान्यता देते वक्त न तोयह देखते है की अनुमोदित टीचर है की नहीं और न ही यह देखते है की इन टीचरों को वेतन दिया गया की नहीं और न ही छात्रो की योग्यता की जांच करते है बस एक बात की ही जांच कटे है वो है नोटों की गद्दिया .कुलपति जी से इस ब्लॉग के मध्याम से अनुरोध है की निजी महाविद्यालय की कमसे कम स्थायी मान्यता देते समय इन बातो का ध्यान अवश्य रखे-

१-सम्बंधित महाविद्यालय में अनुमोदित टीचरों से अध्यापन कार्य करवाया गया है की नहीं इस बात की जानकारी छात्रो से गुप्त तरीके से करे।

२-छात्रो की योग्यता की भी जांच करे।

३-अनुमोदित टीचरों को वेतन ठीक तरह से दिया गया है की नहीं ।

४-पुस्तकालय की किताबे छात्रो में दी गयी की नहीं।

५-छात्रो के खेलकूद की व्यवस्था गत वर्षो में क्या थी।

६-महाविद्यालय की प्रयोगशाला में गत वर्षो में प्रयोगात्मक काम छात्रो ने किया है की नहीं इसकी जांच छात्रो की योग्यता की जाए।

७-महाविद्यालय में छात्रो के लिए शुध्द पेय जल के साधन उचित है की नहीं।

८-छात्रायो के लिए अलग से लेडिज प्रसाधन की व्यवस्था है की नहीं।

९-छात्राओं के लिए कोमन रूम की व्यवस्था है की नहीं .कोमन रूम में उनके बैठने के लिए फर्नीचर है की नहीं.

Sunday, 17 April 2011

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय का संचालन फर्जी अनुमोदन के बल पर:राजेश विश्नोई

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय का संचालन फर्जी अनुमोदन के बल पर चल रहा है.जी हां चौकिये नहीं ये बात एकदम सच है .निजी महाविद्यालय में जो अनुमोदित टीचर है वो केवल कागज तक ही सीमित है वास्तविक तौर पर नहींअसल में ये टीचर दुसरे विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे है.छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय में टीचरों का फर्जी अनुमोदन है वास्तव में ये टीचर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ,आगरा विश्वविद्यालय ,मेरठ विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे है या फिर प्राथमिक या माध्मिक विद्यालय में सरकारी नौकरी कर रहे है.जी हां ये बात एकदम सच है.


अब देखे की कैसे होता है फर्जी अनुमोदन


इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको के द्वारा महाविद्यालय की तरफ से विज्ञप्ति अखबार में निकाली जाती है जिसमे मांग दर्शाई जाती की अमुक विषय की जगह अमुक महाविद्यालय में खाली है .यू जी सी मानक अभ्यर्थी सम्पूर्ण विवरण के साथ आवेदन करे ,वेतन यू जी सी मानक के अनुसार.बेचारे पढ़े  लिखे लोग लालच में आ कर आवेदन कर देते है .आवेदन करने के पश्चात कुछ प्रबंधक तो अभ्यर्थी को बुला लेते है और पूरे साल के केवल कागजो के रेट तय कर लेते है जो १५ हजार से २५ हजार तक  होता है यानी अभ्यर्थी को बिना अध्यापन कार्य किये उस महाविद्यालय से १५ से २५ हजार रुपये तक पूरे साल के दे दिए जाते है और एसे टीचर शायद इस समय परीक्षा में मूल्याकन में भी योगदान कर रहे है .दुसरे वे दबंग प्रबंधक होते है जो अभ्यर्थी का अनुमोदन भी करा लेते है और उसे ना तो साल का पैसा देते है और न ही उसे महाविद्यालय में पदाने देते है.आज शायद छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में शायद ही कोई महाविद्यालय एसा होगा जिसमे सभी विषय के अनुमोदित टीचर हो.बहुत से तो ऐसे  महाविद्यालय है जिनमे पूरे साल भर स्टाफ  के नाम पर केवल चपरासी और बाबू मिलते है टीचर दूर दूर तक नहीं दिखाते है.असल में इस तरह के महाविद्यालय में शिक्षा का उद्देश्य केवल शिक्षा के नाम पर पैसा बनाना है और परीक्षा  में जम के नक़ल करवाना है.अगर आप टीचर का फर्जीवादा  जानना चाहते है तो बस एक काम करे किसी एक विषय का सूचना केवल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय;दोनों विश्वविद्यालय से संबध सभी निजी महाविद्यालय की सूचना दोनों विश्वविद्यालय से मांग ले और स्वयं  जांच कर ले छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय की निजी उच्च शिक्षा की दुकानों का फर्जीवाड़ा जो वास्ताव में डिग्री  बेंच रही है.