आज कल डिग्री कालेज या कोई भी शैक्षणिक संस्थान खोलना कुबेर के खजाने को खोलने जैसा है. वास्तव में इन संस्थानों के प्रबंधक/मालिक धनपशु होते है जिन्हें शिक्षा के विकास और उसके प्रचार प्रसार से दूर दूर तक लेना देना नहीं होता है वे मात्र आर्थिक लाभ हेतु दुकाने खोल कर बैठ जाते है और येन केन प्रकारेण अपनी पाशविक प्रवृत्ति की पूर्ती में लगे रहते है. यह बड़ी चिंताजनक बात है कि उठाईगीर, गुंडे, मवाली, राजनीतिक माफिया ,भ्रष्टाचारी, विश्वविद्यालय के बाबू और जुगाडू टीचर (जिन्हें पढने पढ़ाने से एलर्जी है ) शैक्षणिक संस्थान खोल कर काले धन को सफ़ेद करते है वहा काम करने वाले तीचेर्स को जूती और नौकर समझते है सबसे मजे की बात है कि महान शिक्षाविद का टैग लगा कर सामाजिक सेवा का दंभ लिए मूंछ ऊंची कर घुमते है. इसका प्रमाणस्वरुप छत्रपति शाहूजी विश्वविद्यालय से सम्बंधित संस्थानों के मालिको की पृष्ठभूमि देखिये.
ये प्रक्रिया अपने द्वितीय चरण में है मतलब भ्रष्ट प्रबंधक तो भ्रष्ट कार्यकारिणी. अब इसके आगे का चरण है भ्रस्त और पस्त टीचर. जब टीचर को प्रबंधक की चरणवंदना करके वेतन मिलेगा तो वह पढ़ायेगा क्यों? दूसरी बात कि नक़ल के सहारे छात्रों को जब पास होना है तो वे पढेगे क्यों? अब छात्र भी भ्रष्ट. चौथे चरण में यही छात्र जब शिक्षक बनेगे तब आएगा बल्कि यों कहें कि बस सन्निकट है. ये भूतपूर्व नकलची छात्र अब शिक्षक के रूप में क्या पढायेगे? कि नक़ल कैसे की जाती है? फिर क्या होगा अंधेर नगरी चौपट राजा. शिक्षा व्यवस्था का सर्वनाश समूल नाश.
ऐसी स्थिति को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को शिक्षको की तरह प्रबंधको के लिए भी नोर्म्स फिक्स करना होगा. आयोग को अगर शिक्षा को बचाना है तो प्रबंधको के लिए एक ऐपटीट्यूड टेस्ट अनिवार्य कर देना चाहिए जो नेट परीक्षा की भांति हो. इससे सही मायनो में शैक्षिक संस्थानों में शिक्षा एक उद्द्येश्य एक लक्ष्य के रूप में कायम रह पाएगी
पी के मिश्र