Saturday, 15 November 2014

मेरा मन कही लगता नहीं

मेरा मन कही लगता नहीं ,
ये वतन क्यों जगता नहीं ,
चुप चाप सब हैं जी रहे ,
सच का बाजार चलता नहीं ,
मेरा मन कही लगता नहीं ,
ये वतन क्यों जगता नहीं .......1
मैं चाह कर भी हार हूँ ,
जीवन नहीं करार हूँ ,
आलोक मार्ग दर्शक नहीं ,
अंधेरों का मैं प्यार हूँ ,
मेरा मन कही लगता नहीं ,
ये वतन क्यों जगता नहीं ..........२
रोटी पाने की बस होड़ हैं ,
भ्रष्टाचार क्यों बेजोड़ हैं ,
ये भाई बहनों के देश में ,
सहमा क्यों हर मोड़ हैं ,
मेरा मन कही लगता नहीं ,
ये वतन क्यों जगता नहीं .........३
घर ही नहीं देश टूट रहा है ,
विश्वास,भी अब छूट रहा है,
मारना है जब सच जानते हो ,
मन फिर क्यों घुट रहा हैं ,
मेरा मन कही लगता नहीं ,
ये वतन क्यों जगता नहीं ............४
जीवन में जब हम सिर्फ रोटी तक रह जाते है तो देश , समाज, और घर सब टूट जाते है ......अखिल भारतीय अधिकार संगठन 

Saturday, 1 November 2014

ये है कलयुग के शिक्षक

(अमेरिका में एक वीडियो को १.५ करोड़ लोगो ने लाइक किया जिसमे रस्ते पर चलती लड़की को लोगो द्वारा छेड़ते दिखाया गया था पर मेरी इस पोस्ट पर आप क्या करेंगे ????)
शिक्षक ????????????? किसको वोट देना चाहता है .........
कालेज की महिला शिक्षकाये ( उनका नाम नहीं लिख सकता ) अपने चरित्र के साथ समझौता करके ही तो आगे गयी है ( मैं इस से ज्यादा खुल कर शब्द नहीं लिख सकता क्योकि मेरे माँ बहन है ) और ऐसा एक शिक्षक शिक्षक संघ का नेता चुना जाता है | मैं उस नेता का नाम इस लिए नहीं लिख रहा क्योकि वो बदनाम हो न हो उसकी माँ जरूर लज्जित होंगी वैसे तो उनके खुद एक लड़की है | मैंने उस शिक्षक के कालेज में प्राचार्य से शिकायत की , प्रबंधक से शिकायत की वो भी लिखित पर आज तक उन लोगो ने कोई कार्यवाही नहीं की | क्या इस पोस्ट को पढ़ने वाले सभी सम्मानित भारतियों को क्या ये नहीं लगता कि ऐसे शिक्षक को सजा मिलनी चाहिए | मुझसे कहा गगया कि कोई महिला तो शिकायत करने आई नहीं | तो क्या महिलाओ कि ऐसे ही सम्मान होता है शिक्षण संस्थानों में | क्या प्रबंधक भी शामिल है महिलाओ के अश्लील मजाक में ??????????? क्या आप सब आवाज उठाएंगे इस पोस्ट के समर्थन में या आप उस शिक्षक को समर्थन देंगे जिसका कहना है कि महिला आगे बढ़ती है अपने समर्पण से .............(ऐसे उच्च कोटि के शिक्षकों के लिए क्या मुझे चुनाव लड़ना चाहिए था ???????)

शर्म किसमे

एक पूँछ उठाये ,
कुत्ते को देख ,
मैंने लाल पीले ,
होते हुए कहा ,
क्या तुम्हे शर्म ,
नही आती है ,
कुत्ते ने बड़े ही ,
शालीनता से ,
कहा कि आदमी ,
के साथ रहने ,
वाले के पास शर्म ,
रह कहा जाती है .........

Monday, 27 October 2014

जीवन किसका कैसा

जानता हूँ मौत मेरे ,
इर्द ही है  घूम रही ,
चल जिंदगी तुझे कोई ,
फिर मिल जाये सही ,
रास्ते होते नही खुद ,
बनाये जाते यहाँ ,
खीच ले एक बार फिर ,
आज फिर जाता कहाँ,
श्वानों के शोर से ,
गज कभी डरता नहीं ,
गीदड़ों के बीच में ,
वीर कभी मरता नहीं ,
सीपियों के बीच में ही ,
मोती की पहचान है ,
स्वाति की ओज से ,
नहीं कोई अनजान है ,
मुस्कराता गुलाब देखो,
काँटों के बीच रह कर ,
जी कर एक बार देखो ,
झूठो के बीच रह कर ,
कर्ण हरिश्चंद्र सब यही ,
सच के खातिर जी गए ,
जो जिया न्याय को ,
नाम उसी के रह गए ...................राम , कर्ण , हरीश चन्द्र राणा प्रताप कुछ ऐसे नाम है जिनके जीवन में हमेशा सुख बना रहता है अगर वो अपने जीवन को उस तरह से चलते जैसा झूठे फरेबी , मक्कार , असत्य पर चलने वाले चाहते थे पर ऐसा ना करके ही उन्होंने समाज और उसका अर्थ हमारे सामने रखा , शिक्षकों से अपील है कि वेतन भोगी से ज्यादा एक ऐसी रास्ते का निर्माण करें जिससे आने वाली पीढ़ी एक और उन्नत सामज को बनाने में योगदान कर सके

जीवन और मौत

तोड़ कर मुस्कराहट
का एक गुच्छा ,
काश मैं तुझको ला,
के दे पाता,
बदहवास सी होती ,
जिंदगी को कोई ,
तिनके का सहारा ,
करा पाता,
बहती ना अंतस ,
की जिन्दा कहानी ,
जो तूने हर रात ,
बुनी  थी कि ,एक राजा ,
था एक रानी ,
चांदनी सी पसरती ,
झींगुरों के गान में ,
नीरवता को समेटे ,
तिमिर किसी प्रान में ,
सिर्फ शेष अब रह गया ,
समय का वो उजास ,
गुजरे जिनमे थे कभी ,
सिंदूरी से प्रकाश ,
लगता है हो कही यही ,
पर सच ये भ्रम है ,
आने जाने का यहाँ ,
ना जाने कैसा क्रम है ...................जीवन और मौत दोनों एक मात्र सच है

Tuesday, 21 October 2014

लक्ष्मी गणेश की पूजा साथ में क्यों

ली के इतने रंग है कि क्या क्या लिखूँ??/
आज मैं अपने शिष्य के साथ लक्ष्मी गणेश लेने गया | विद्यार्थी बार बार गुरु गुरु जी कर रहा था | मैं कह रहा था कि भगवन को लेने में क्या सुन्दर और अच्छा \ दुकान दार मेरे लम्बे बालों को देख कर समझा कि शायद कोई पडित जी है | उसने उत्सुकतावश पूछ लिया कि गुरु जी ये लक्ष्मी गणेश साथ साथ जब कि लक्ष्मी जी तो विष्णु जी की पत्नी है | हमारे देश का यही दोष महिलाओं को जीने नही दे रहा कि पुरुष दिखा नहीं साथ में कि सोच में बस एक रिश्ता और एक कुंठा !!!!! मैंने कहा कि  लक्ष्मी गणेश जी के किस तरफ रखी जाती है ??? उसने कहा दायीं तरफ !! तो मैंने कहा कि भरित्ये परम्परा में दाई तरफ स्त्री के भाई या पुत्र ही बैठता है | अब बात रही कि गणेश जी लक्षिमी के भाई है या पुत्र तो पुराण में उसकी एक कहानी है ___________ एक बार विष्णु और लक्ष्मी में श्रेष्ठता को लेकर बहस होने लगी लक्ष्मी का मानना था कि दुनिया उन्ही के कारण चल रही है और विष्णु पालनहार होने के कारण अपने को उच्च बता रहे थे | क्रोध में आकर विष्णु ने लक्ष्मी से कह दिया कि अपने घर को एक संतान तक दे नहीं पायी तुम क्या किसी और का जीवन चलाओगी??? लक्ष्मी को ये बात चुभ गयी कि विष्णु जी ने उन्हें संतान न होने का ताना दिया है | और वो दुखी मन से अपने सहेली पार्वती के पास पहुंची और साडी घटना बताई | ये सुन कर पार्वती बोली कि मेरी दो  संतान कार्तिकीये और गणेश है जो तुम चाहो एक ले लो | लक्ष्मी जी ने गणेश पर सहमति जताई तो पार्वती जी ने उनको गणेश जी को दे दिया | पार्वती का ये त्याग देख कर लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुई और बोली कि मैं अपने दत्तक पुत्र गणेश का विवाह अपनी देवियों ऋद्धि और सिद्धि से करुँगी और मेरी कोई भी पूजा तब तक सार्थक नहीं होगी जब तक लोग मेरे पुत्र गणेश की पूजा साथ में नहीं करेंगे | और बस माँ पुत्र की पूजा शुरू हो गयी तब से | मेरी बात सुन कर दुकानदार बोला कि गुरु जी आपने पहली बार मेरे संदेह को दूर किया आपका धन्यवाद | मैंने कहा सुनो बाद में गणेश की शादी ऋद्धि सिद्धि से हुई और उनसे दो पुत्र शुभ और लाभ हुए | अब तो आप जान गए होंगे कि घर में गणेश , ऋद्धि सिद्धि और शुभ लाभ क्यों लिखा रहता है | तो जब भी किसी त्यहार को मानिये तो उसका दर्शन जरूर जानिए और इसी लिए अखिल भरित्ये अधिकार संगठन आपको जागरूक करने सतत लगा हुआ है | आपको सभी को पटाखा मुक्त आलोक पर्व शुभ हो

आदमी कहा चला गया

मर जाने पर तो ,
जान भी लेते है ,
लोग की सामने वाले ,
घर में रहता था कौन ,
जिन्दा रहने पर,
सामने रहता है ,
कौन सुनकर साध ,
लेते है मौन ,
क्यों बना रहे है हम ,
मौत से रिश्तों को ,
जानने का सिलसिला ,
जिन्दा रहने पर ,
कितना अकेला रहा ,
आदमी उसे क्या मिला ?
कभी मुड़ कर देख ,
लिया करो उसका भी ,
घर जो तुम्हारा नहीं ,
देखती है आँखे आरजू से ,
जो आदमी है सिर्फ ,
रिश्तों में हमारा नहीं .................आज हम क्यों नहीं आदमी के लिए खड़े होते है बल्कि हम उसके लिए पूछते है यार ये जो मरा कौन था या फिर लाश घाट पर कब पहुंचेगी ? या हम उसके लिए क्यों कुछ करें ????? ,