Tuesday, 16 September 2014

प्रेम अपराध नहीं तो क्या है

प्यार कर ले घडी दो घडी .............
देख अगर तू मेरी न हो सकी तो किसी की नहीं होने दूंगा तुझे ?? क्या समझती है अपने  आपको और ये ले तेजाब की शीशी पूरी की पूरी नारी को देवी कहने वाले देश में एक लड़की को मंगल ग्रह का बना गयी खैर ऐसा ना करें तो पता कैसे चले की भाई साहब प्रेम करते थे | वैसे प्रेम का मतलब यह कुछ निराला है बात उन दिनों की है जब मैं गुजरात के शहर सुरेन्द्र नगर की एक तहसील लिमडी के एक गाओं नाना कठैची में मानवशास्त्रीय  शोध कर रहा था और एक व्यक्ति अपनी पत्नी को किसी बात पर ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ....की तर्ज पर शंख नाद कर रहा था ...मुज्झे अपने कर्तव्य याद आये मैंने रोक तो पुरुष चला गया पर उसकी पत्नी गुस्सा हो गयी क्यों आये बीच में कम से कम मारने से पता तो चला कि वो मुझसे प्रेम कितना करता है !!!! ऐसा हो सकता प्रेम आपने भी देखा हो लेकिन आज कल प्रेम के नाम पर एक लड़ाई चल रही है पशुओ में ज्यादातर मादा के लिए नर ही लड़ते है और शक्ति प्रदरसहन के अनुसार वरण करते है मनुष्य ने भी बहुत दिनों तक स्वयम्बर में औरत के वर्चस्व को स्वीकार किया और यद्ध में जीती गयी जमीन कि तरह औरतो  ने भी जिसकी लाठी उसकी भैस का नियम माना लेकिन ये कौन सा युग है जब औरत मानी तो मानी नहीं तो सिर्फ मौत , तेजाब , बदनामी , ???क्या औरत के तन मन का उसके जीवन के लिए कोई मान रह गया है ? ओह हो मैं तो भूल ही गया कि महिला सशक्तिकरण का यही तो मतलब है अगर महिला का शोषण नहीं होगा तो महिला प्रतिरोध कैसे करेगी और प्रतिरोध के बिना  कोई शक्तिशाली कभी कहला पाया है भला ???? आखिर आपको महापुरुष जो कहलाना है | चलिए  १४ वी  शताब्दी में दो प्रेम करने वाले लोगो के कब्र क़ी फोटो जो इंग्लॅण्ड में खुदाई से प्राप्त हुई है , को देख कर सोचिये कि हाथ पकडे ये दोनों युगल जोड़े मरने के बाद भी प्रेम की किस कहानी को बता रहे है ??? शायद मानव होने का मतलब यही है प्रेम यहाँ मना है क्योकि हम मनुष्य है जो प्रेम से ज्यादा अधिकार के लिए जीता है वैसे आप क्यों मानने लगे मेरी बात आखिर कोई जानवर तो है नहीं जो बस सर झुका कर मान ले जो कहा गया !!!!!! एक बार एक जानवर माँ ने अपने इधर उधर घूमते देख कर अपने बेटे से क्रोध में कहा ......आदमी कही का ( जैसे आप कहते है गधा कही का ) आदमी जानवर क्यों नहीं बन पाया ????????( व्यंग्य ही समझिए )

Monday, 15 September 2014

कुशल मानव क्यों हम नहीं है

कब हम स्किल्ड ( कुशल ) बनेंगे ??
आज मैं करीब १२.२० के आस पास राम सागर मिश्रा पोस्ट ऑफिस जिसे अब इंदिरा नगर पोस्ट ऑफिस कहतेहै , गया कुछ पत्र पोस्ट करने गया था जब से अपनी माँ को लगातार पत्र लिखने के कारण मेरा नाम विश्व रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है तब से पोस्ट ऑफिस वाले भी मुझे थोड़ा अलग तरह से देखते है , खैर एक लड़का करीब २० साल का स्पीड पोस्ट वाले बाबू जी से बहस कर रहा था और वो कह रहे थे पूछ ताछ पर जाओ पर वह भी भीड़ होने के करें लड़का वही अपनी समस्या का समाधान चाहता था | मुझे देख कर बाबू जी बोले देखो तुम इन डॉक्टर साहब से अपनी बात समझ लो | मुझे आश्चर्य हुआ कि लड़का ये नहीं जानता था कि लिफाफा किस काउंटर पर मिलता है खैर जब वो ये जान गया तो उसको ये नहीं मालूम कि स्पीड  पोस्ट क्या होता है और रजिस्ट्री क्या होती है पर उसका कहना था कि घर से उससे कहा गया हैकि रजिस्ट्री करके आना मैंने कहा पहले तो स्पीड पोस्ट सस्ता होता है , इसके पहुचने में जल्दी ध्यान दिया जाता है और तुम चाहो तो आज के बाद रोज नेट पर बैठ कर स्पीड पोस्ट की वेब साइट पर जाकर अपने पत्र को ट्रैक कर सकते हो यानि जान सकते हो कि अब वो कहा है इसके लिए तुमको रसीद पर पड़ा नंबर डालना होगा | इतना बताने के बाद भी वो ये नहीं जानता था कि लिफाफे पर किसका किसका नाम जाता है मैंने पूछा पढ़ते हो तो बताया लखनऊ के एक कॉलेज से एम कॉम कर रहा है | मैंने देखा कि कई लोग मेरी बात सुन रहे थे और लिफाफे को सही कर रहे थे जैसे लिफाफे पर स्पीड लिखने या पिन नंबर डालने के लिए कोई ध्यान ही नहीं रहता है | अचनक मेरे पीछे कड़ी एक लड़की ने मेरे लम्बे बल देख कर खा क्या आप सोशल वर्कर है या एक्टिविस्ट मैं उसके प्रश्न  पर शांत रहा और फिर बोला एक शिक्षक ज्यादा हूँ शायद | और जब कॉलेज बताया तो मत पूछिये कहिर उस लड़के ने पैर छूटे हुए कहा कि क्या मैं ऐसे गुरु का नंबर ले सकता हूँ ?? मैंने अशोक को नंबर दिया और कहा कि गुरु कीसी कॉलेज या क्लास से बंधा नहीं होता वो सिर्फ गुरु होता है ? मैं चल दिया पर सोचता रहा कि नरेंद्र मोदी शायद इसी शिक्षा के विरोधी है जिसमे लोग एम ए, एम कम तो हो जाते है पर व्यवाहरिक बिलकुल नहीं होते उनको कोई जानकारी नहीं होती , शायद हम सभी को मोबाइल , कार , टी वी कि तकनीक भी पता होनी चाहिए मुझे लगा कि मोदी देश को सही अर्थो में स्वालम्बी बनाना चाहते है लेकिन क्या आपको पता है सबसे पहला स्किल्ड मैन कौन था चलिए मैन बताता हूँ होमो हैबिलिस ( स्किल्ड मैन ) आज से २३ लाख साल पहले जिसने उपकरण को बनाना सीख कर जीवन को गति दो थी तो क्या हम उससे पीछे रह गए ??????/सोचिये और एक नए कल का सूत्रपात्र कीजिये ( अखिल भारतीय अधिकार संगठन )एक सच जो व्यंग्य जैसा लगता है

Saturday, 13 September 2014

हिंदी बोलना ....भाषा या निराशा

हिंदी दिवस या देव नागरी दिवस ....
जब इस देश में हिन्दू या हिदुस्तानि शब्द को लिया जाता है तो न जाने कितना विरोध होता है पर हमने तो अपनी देवनागरी लिपि को हिंदी कहे जाने पर भी ख़ुशी से स्वीकार कर लिया क्योकि जब सैकड़ो सालों से हमने इस देश में आने वाले मनुष्यों को स्वीकार किया तो फारस के लोगो के त्रुटिपूर्ण उच्छारण से उपजे शब्दों को भी हमने आत्मसात कर लिया | वैसे तो संविधान के अनुच्छेद १ के अनुसार इंडिया दैट इज़ भारत  है पर अनुच्छेद ३४९ के अनुसार अगर किसी भी भाषा के शब्द को ज्यादा प्रयोग में लाया जायेगा तो वो हिंदुस्तानी कहलाएगी और इसी हिंदुस्तानी को परिभाषित किया गया १४ सितम्बर १९४९ को अनुच्छेद ३४३ में हिंदी राज भाषा के रूप में ना की राष्ट्रीय भाषा के रूप में | नेहरू इसके समर्थन में नही थे कि हिंदी राज भाषा भी बने पर हिंदी से चिढ़ने वाले राज्य तमिलनाडु के लब्धि प्राप्त मंत्री मेनन ने अपने एक मात्र वोट से संसद से हिंदी को विजय दिलवाई और बन गयी हिंदी राजभाषा | पर क्या आज हिंदी दिवस मना कर हम हिंदी को श्रद्धांजलि देते है या फिर उसके मान को बढ़ाते है क्योकि जिस तरह से अंग्रेजी का महत्त्व बढ़ा है उससे तो भारतीय नारी की देवी वाले स्वरुप की तरह एक वीभत्स स्वरुप ही सामने आता है | क्या मजाल आप हिंदी बोल कर अपने को श्रेष्ठ साबित कर दे ! इंदिरा गांधी मुक्त राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में होने वाले किसी साक्षात्कार के आने वाले पत्र में लिखा रहता है कि अगर आप हिंदी में साक्षात्कार देना चाहे तो सूचित करें पर सुचना देने के बाद भी आप से सारा साक्षात्कार अंग्रेजी में ही लिया जायेगा और गर आपने नैतिक शिक्षा पढ़ाई तो आपका सत्यानाश  तो होना ही है  | अगर हिंदी के साथ सड़क पर लड़की के साथ होने वाले छेड़ छाड़ को महसूस करना हो तो इसी विश्विद्यालय के हिंदी में दिए जाने वाले पथ्य सामग्री को उठा कर पढ़ लीजिये , उलटी और दर्द से आपका सर न फट जाये तो कहियेगा | मानवशास्त्र जैसे विषय में आज तक कभी प्रयोगात्मक परीक्षा के पेपर हिंदी में लखनऊ विश्व विद्यालय में छपे ही नहीं क्योकि शिक्षकों को हिंदी आती ही नहीं आरे भैया हिंदुस्तानी तो लिख सकते हो ???? २४ फ़रवरी १९९९ में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में मेरा शोध पात्र सदी के अंत में मानवशास्त्र हिंदी में था जिसमे मैंने उस समय गे संस्कृति का विश्लेषण किया था | भारत के प्रसिद्द मानवशास्त्री प्रोफ़ेसर गोपाल सरन जी के बाद ही मेरा पेपर था और मुझ पर बराबर दबाव डाला गया कि मई अपना पेपर अंग्रेजी में लिख कर दूँ क्योकि ये एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी है और हिंदी काबुल नहीं खैर मुझे अंग्रेजी में करना पड़ा और दूसरे दिन उस शोध पत्र तो द ट्रिब्यून समाचार पत्र ने छापा जो भारतीय हिंदी से इतना अपमानित महसूस करते है उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि चीन में अपना मानव शास्त्र का अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी चीनी और अंग्रेजी दोनों में की | इंग्लैंड में २०१३ में हुए मानवशास्त्र के अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में ये विकल्प भी था कि अगर आपकी भाषा में बोलने वाले प्रयप्त है तो आप अपनी भाषा में पैनल आयोजित कर सकते है | क्या वास्तव में हम कभी भाषा का सम्मन कर पाएंगे | शायद अटल जी ने तो सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संघ में १९७७ में हिंदी में भाषण देकर वह वही लूटी थी पर नरेंद्र मोदी जी ने हिंदी बोलने वालो के मन से झिझक मिटाने के लिए और दुनिया के किसी भी मंच से हिंदी में ही अपनी बात करके ये बता दिया है कि आप भी अपने देश में हर जगह हिंदी के सहारे आगे जा सकते है | क्या आप हिंदी के लिए इतना कर पान एक सहस रखते है या फिर सिर्फ मोदी मोदी कहने के लिए पैदा हुए है | मोदी ने तो अमेरिका के विदेश मंत्री से भी हिंदी बोलवा दिया है क्या आप ऐसा करने का सहस रखते है तो आइये फिर मना डालिये हिंदी दिवस ...हिंदुस्तान में ( अखिल भारतीय अधिकार संगठन )

उपचुनाव से ज्यादा शिक्षक जरुरी राष्ट्र में

उपचुनाव का खोखलापन .....
आज  उत्तर प्रदेश में ११ विधान सभा और ३ लोकसभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए |देश के महाविद्यालयों और विश्विद्द्यालयों में ना जाने कितने सृजित पद खाली पड़े है पर पैसे की कमी के कारण ठेके पर कुछ रुपये महीने देकर शिक्षा में काम चलाया जा रहा है | देश के चुनाव आयोग को इस बात का ज्ञान है कि महंगाई कितनी बढ़ गयी है , इस लिए उसने उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा बढ़ा कर ५० लाख कर दी है यानि एक सीट पैट काम से काम सरकारी तौर पर अगर चार पार्टी के लोग खड़े है तो दो करोड़ रुपये खर्च हो जाते है | अगर सत्ता में रहने वाली पार्टी की बात करें तो उसके हर उमीदवार के चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार खर्च किये गए पैसे से पूर्ण तया नियुक्त सहायक आचार्य या असिस्टेंट प्रोफ़ेसर को करीब ८५ से ९० महीने का वेतन मिल सकता है यानि चुने हुए प्रतिनिधि जितने पैसे से सिर्फ साथ महीने सत्ता में रह पाते है उतने पैसे से राष्ट्र को एक शिक्षक करीब ९० महीने केलिए मिल सकता है | ध्यान रहे इसमें चुनाव के सरकारी खर्चे नही शामिल है जैसे बूथ , कर्मचारी , पुलिस, सेना , मतगड़ना  आदि | आप कहेंगे तो क्या चुनाव बंद  करा दिए जाये ? नहीं बल्कि जनता को सोचना होगा कि उनका भविष्य किस्मे ज्यादा अच्छा है | एक अच्छा शिक्षक राष्ट्र को चन्द्र गुप्त , शिवा जी , राजा जनक , राम , कृष्ण ,रना प्रताप देता है पर एक नेता सिर्फ जनप्रतिनिधि बन कर अपने सुख पर ध्यान देता है | मेरा सिर्फ यही कहना है कि कैंसर की दवा की तरह मुख्य चुनाव अगर जरुरी है तो उपचुनाव तो ताले जा सकते है ! जब भी किसी क्षेत्र से जितने भी उम्मेदवार चुनाव लड़े तो सब से एक शपथ पत्र लिया जाये कि वो पांच वर्ष अपनी सीट नहीं छोड़ सकते और अगर छोड़ते है तो उनकी जगह जो उपविजेता रहा होगा वो वह का जनप्रतिनिधि कहलायेगा ना कि फिर से चुनाव होंगे | इस से राष्ट्र का पैसा बचेगा और हर जनप्रतिनिधि चाहे वो जीते या हारे अपने क्षेत्र केलिए संवेदनशील रहेगा | लेकिन जाते जाते इतना जरूर कहूँगा कि शिक्षा के लिए जिस देश में पैसा नहीं वह पर ऐसे चुनावों से पैसा रोक जाना चाहिए ( ये जीवन का असली व्यंग्य है इस  देश में )

Thursday, 11 September 2014

रिश्ते की गहराई सिर्फ पति पत्नी में

सबसे बड़ा रिश्ता पति पत्नी का ..........
वैसे तो जिसे देखिये यही कहता मिल जायेगा कि पृथ्वी पर माँ पिता से बढ़ कर कोई नहीं और ज्यादा दूर जाने की क्या जरूरत कुछ दिन पहले मैंने खुद यही लोरी आपको सुनाई थी और आपको नींद भी सुकून की आई थी पर मुझे तो नींद ही नहीं आई अब देखिये जिसे देखिये अपने माँ बाप के साथ नहीं रह रहा और ज्यादा  उबा तो वृद्धा आश्रम में बैठा दिया पर भारतीय विधि में पति पत्नी के जितने भी अधिकार सुरक्षित किये गए है उसमे विवाह अधिनियम के क्या कहने अगर पति या पत्नी एक दूसरे की इच्छा ????? का ध्यान नहीं रख रहे है तो इस आधार पर तलाक हो सकता है यानि आपको मन के साथ ..........का भी ख्याल रखना है खैर आपको ऐसी बात सुन्ना पसंद नहीं क्योकि आप संस्कृति पूर्ण देश में रहते है जहा टी वी पर महिला पुरुष के जीवन से सम्बंधित विज्ञापन इतने आने लगे कि कहा तक भाई और पिता या माँ और बहन उतर इधर उधर जाये या जोर जोर चिल्लाने  लगे अब देखते देखते उन्होंने शर्म के आगे बे ( वैसे गुजरती में बे का मतलब दो होता है ) लगा लिया यानि दोनों शर्म के साथ ये सब देखेंगे ओह मैं तो भूल गया कि आप तो पति पत्नी के बारे में जानना चाहते है हा तो इस रिश्ते से ज्यादा गहरा कोई रिश्ता नहीं पूछिये कैसे वो ऐसे कि अगर माँ बनने के समय कोई ऐसी स्थिति आ जाये कि एक को ही बचाया जा सकता हो तो पति कहता है डॉक्टर साहेब बचने की कोशिश दोनों को कीजिये पर अगर ऐसा ना हो सके तो फिर माँ को बचाइये अब तो मानते है ना कि पति पाती का रिश्ता कितना गहरा है नहीं मानेंगे तो लीजिये दूसरा छक्का अगर बेटा आवारा हो जाये और पिता घर से उसे निकाल दे तो अगर माँ ने विरोध किया तो पिता कहता है कि तुम भी इस के साथ जा सकती हो पर ऐसी स्थिति में माँ पत्नी रहना ज्यादा उचित मानती है और मानिये ना मानिये कहते है जहाँ ज्यादा प्यार होता है वही नाराजगी भी ज्यादा होती है लड़ाई भी ज्यादा होती है तो क्या अब भी बताऊ कि घर में सब से ज्यादा प्यारी पत्नी क्यों होती है | मेरा मतलब जहाँ दो बर्तन होते है वो टकराते ही रहते है और दो की कल्पना तो बस हम दो से ही यानि पति पत्नी  से होती है | मेरी बात सुन कर एक सज्जन कहने लगे कि फिर दोनों अलग अलग क्यों मरते है मैंने कहा क्योकि पति कभी भी अपनी पत्नी के साथ कही नहीं जाना चाहता वो अकेले ही जाता है अब अगर स्वर्ग गया तो अप्सरा और अगर नीचे रहा तो ??????????? अब तो मान ही लीजिये कि पति पत्नी से गहरा कुछ भी नहीं ( व्यंग्य समझ कर पढ़िए )

Wednesday, 10 September 2014

जिन्दा वही जिसके पास पैसा

जिनके पास पैसा वही ज्यादा सुरक्षित ...
मैं आज तक नहीं जान पाया कि भले बाढ़ आये , तूफान आये , भूकम्प आये , युद्ध हो या भी कही भगदड़ मच जाये तो न तो कोई नेता मरता है और न ही कोई अभिनेता या उद्योगपति मरता है या बेघर होता है तो क्या पैसे वाले ज्यादा सुरक्षित है ???? हा हा आप नहीं मानेंगे क्योकि आप कुछ न कुछ उदाहरण पैदा कर देंगे पर क्या अभी आपको जम्मू कश्मीर , उत्तर प्रदेश , बिहार में आई बाढ़ को भूल जाते है कि जितने मारे गए वो ज्यादातर पैसे वाले नहीं थे | और कभी ट्रैन को देखने चले जाइये ट्रैन के आगे और पीछे सामान्य डिब्बा लगता है यानि ये डिब्बा उन लोगो से भरा रहता है जो देश के गरीब लोगो का प्रतिनिधत्व करते है और ए सी डिब्बे बिलकुल बीच में लगते है यानि अगर एक्सीडेंट हो तो सबसे ज्यादा कौन मारे सामान्य डिब्बे के लोग तो क्या अब भी आप नहीं मानेंगे कि देश में जिनके पास पैसा नहीं वही ज्यादा मरते है |अभी भी नहीं मानेंगे तो लीजिये एक और उदाहरण चिकित्सा विज्ञानं ने इतनी उन्नति कर ली है कि अगर आपकी सांस भी टूट रही हो तो आपको कृत्रिम सांस से जिन्दा रखा जा सकता है | ह्रदय, किडनी , लिवर सभी का प्रत्यारोपण हो सकता है पर इसको करा कौन सकता है गरीब के नसीब में तो मारना ही है ना यनि कारन है कि पैसे के कारण अस्पताल में सामान्य वार्ड प्राइवेट  वार्ड होते है तो हुई न गरीब कि जान सस्ती | केले खदान का मालिक कभी उसमे दब कर नबल्कि मरता है वो व्यक्ति जिसके पास पैसा नहीं और वो अंदर घास कर कोयला खोदता है | मतलब सिद्ध हो गया कि गरीब ज्यादा इसी लिए  मरता है क्योकि उसके पर पैसा नहीं और नेता अभिनेता कम मरते है क्यों नहीं पूरे कश्मीर के घर ऐसी जगह है जैसे उमर अब्दुल्ला या रुबिया सईद के है अब तो समझ लीजिये कि अगर पैसा है तो आप ज्यादा जी सकते है क्या अब भी बताना पड़ेगा कि लोग पैसे के लिए क्यों भाग रहे है , अपने माँ बाप को घर से क्यों निकाल रहे है ?? अरे भाई उनको ज्यादा जो जीना है ( व्यंग्य समझ कर पढ़िए )

Tuesday, 9 September 2014

हम मनुष्य है मनुष्य

हम मनुष्य है मनुष्य कोई ?????
पूरी पृथ्वी पर जितने भी जीव जंतु है उन सभी में प्रकृति ने एक नर और एक मादा की रचना की है शायद मुझको ऐसा लगता है कि सभी में मादा कि संख्या कम ही होती है क्योकि मादा को पाने के लिए सभी में नरों के बीच एक संघर्ष चलता है यानि एक बात तो तये है कि आज तक मनुष्य ये नहीं चाहता कि वो जानवरों से अलग दिखाई दे इसी लिए वो लड़कियों कि संख्या बढ़ने नहीं दे रहा है और दूसरी बात ये आज तक सारे मनुष्य जानवरों कि तरह लड़कियों और औरतों को पाने के लिए संघर्ष करते रहते है यानि अभ भी हम अपने मूल तत्व को नहीं छोड़ना चाहते और छोड़े भी क्यों वो मनुष्य ही क्या जो अपनी मूल परम्परा को भूल जाये लेकिन मानिए या ना मानिये एक बात तो में तो हम मनुष्य बन ही गए है आखिर हमने संस्कृति सभ्यता का निर्माण किया है | अब परेशान ना होइए और सुनिए कल एक रेस्त्रां से दो लड़कियां  खाना कहने के बाद निकली कुछ दूर चलने पर एक गाड़ी पीछे से आई और अपने को स्वस्थ दिखने के लिए लड़कियों पर कमेंट करके आगे जाने लगे पर आज कल मेरी कॉम का जमाना है और एक लड़की ने इसका प्रतिकार किया तो लड़को ने गाड़ी रोक कर जितनी बदतमीजी कर सकते थे करी शायद द्रौपदी को भी शर्म आ जाती पर वह खड़े बहुत से मनुष्य चुप चाप सब होता देखते रहे और देखे भी क्यों ना वो मनुष्य है कोई कुत्ते तो है नहीं जो उनके इलाके में कुछ किसी ने किया नहीं कि सब मिल कर दौड़ पड़े | मैं तो कहता हूँ बिलकुल सही किया इन मनुष्यों ने आखिर पता कैसे चलेगा कि हम सभ्य है और अब जानवर नहीं रह गए है | मेरे सभी से निवेदन हैकि अपनी लड़कियों और औरतों को घर से न निकलने दे क्योकि अब शहर में मनुस्य रहते है जानवर नहीं ( व्यंग्य समझ कर पढ़िए एक सच )