Sunday, 1 May 2011

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से एक अपील; उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रबंधको के लिए ऐपटीट्यूड टेस्ट अनिवार्य किया जाये

आज कल डिग्री कालेज या कोई भी शैक्षणिक संस्थान खोलना कुबेर के खजाने को खोलने जैसा है. वास्तव में इन संस्थानों के प्रबंधक/मालिक  धनपशु होते है जिन्हें शिक्षा के विकास और उसके प्रचार प्रसार से दूर दूर तक लेना देना नहीं होता है वे मात्र आर्थिक लाभ हेतु दुकाने खोल कर बैठ जाते है और येन केन प्रकारेण अपनी पाशविक प्रवृत्ति की पूर्ती में लगे रहते है. यह बड़ी चिंताजनक बात है कि उठाईगीर, गुंडे, मवाली, राजनीतिक माफिया ,भ्रष्टाचारी, विश्वविद्यालय के बाबू और जुगाडू टीचर (जिन्हें पढने पढ़ाने से एलर्जी है ) शैक्षणिक संस्थान खोल कर काले धन को सफ़ेद करते है वहा काम करने वाले तीचेर्स को जूती और नौकर समझते है सबसे मजे की बात है कि महान शिक्षाविद का टैग लगा कर सामाजिक सेवा का दंभ लिए मूंछ ऊंची कर घुमते है. इसका प्रमाणस्वरुप  छत्रपति शाहूजी विश्वविद्यालय से सम्बंधित संस्थानों के मालिको की पृष्ठभूमि देखिये.
 ये प्रक्रिया अपने द्वितीय चरण में है मतलब भ्रष्ट प्रबंधक तो भ्रष्ट कार्यकारिणी. अब इसके आगे का चरण है भ्रस्त और पस्त टीचर. जब टीचर को प्रबंधक की चरणवंदना करके वेतन मिलेगा तो वह पढ़ायेगा क्यों? दूसरी बात कि नक़ल के सहारे  छात्रों को जब पास होना है तो वे पढेगे क्यों? अब छात्र भी भ्रष्ट. चौथे चरण में यही छात्र जब शिक्षक बनेगे तब आएगा बल्कि यों कहें कि बस सन्निकट है. ये भूतपूर्व नकलची छात्र अब शिक्षक के रूप में क्या पढायेगे? कि नक़ल कैसे की जाती है? फिर क्या होगा अंधेर नगरी चौपट राजा. शिक्षा व्यवस्था का सर्वनाश समूल नाश.
ऐसी स्थिति को रोकने के लिए विश्वविद्यालय  अनुदान आयोग को  शिक्षको की तरह प्रबंधको के लिए भी नोर्म्स फिक्स करना होगा. आयोग को अगर शिक्षा को बचाना है तो प्रबंधको के लिए एक ऐपटीट्यूड टेस्ट अनिवार्य कर देना चाहिए जो नेट परीक्षा की भांति हो. इससे सही मायनो में शैक्षिक संस्थानों में शिक्षा एक उद्द्येश्य एक लक्ष्य के रूप में कायम रह पाएगी

                                                                                                                 पी के मिश्र  

9 comments:

  1. बढ़िया है . लेकिन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ये कैसे सुनिश्चित करेगा की विद्यालय की स्थापना में कला धन ना लगा हो . या ऐसी परीक्षा पास करने वाला प्रबंधक भी एक कठपुतली भी तो हो सकता है .

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  2. मेरा भी मानना है कि ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए जिससे संस्थान खोलने वालों का वास्तविक उद्देश्य सामने आ जाये| यह सच है कि आज अगर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा अपना अस्तित्व खो रही है तो चलाने वाले भी जिम्मेदार हैं| लेकिन उससे भी ज़रुरी यह है कि ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति की जाए जो सच में काबिल हों जबकि आज काबिलियत ही खोती जा रही है, संपर्क मायने रखता है|बहरहाल सुझाव अच्छा है आयोग को भेजिए

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  3. अगर एसा हो जाये तो जाये तो भारत एक महान देश बन जायेगा.महाविद्यालय के प्रबंधक को टीचर की गुर्न्वात्ता से कोई मतलब नही रहता है .आजकल तो निजी महाविद्यालय के प्रबंधक को चरण चापू एसा टीचर चाहिए जो छात्रो को काबू में कर सके.वास्तव में आजकल निजी महाविद्यालय केवल छात्रो के ragistration के केंद्र है और कुछ नही .बहुत से महाविद्यालय ऐसे जो केवल ragistration और परीक्षा के समय ही खुलते है बाकी के समय ये बंद रहते है.प्रबंधक का टेस्ट होना ही चाहिए.

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  4. यह पोस्ट कपिल सिब्बल और यू जी सी भेज दी गयी है

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  5. प्रबंधको का टेस्ट होना ही चाहिए.जब टीचर अनुमोदन से लेकर नेट ,Ph डी और M फिल तक टेस्ट दे कर आता है तो प्रबंधक का टेस्ट क्यों नही होना चाहिए?आज निजी महाविद्यालय के अधिकांश प्रबंधको को ये तक मालूम नही है की उनकी निजी महाविद्यालय की शिक्षा की दूकान में किस किस विषय की डिग्री बेचीं जाती है,कौन कौन सी संकाय उनके यहाँ चल रही है.तो इसे में शिक्षा की गुणवत्ता कैसे राखी जा सकती है.आज निजी महाविद्यालय के प्रबंधको को चरण चापू टीचर चाहिए और चरण चापू टीचर जो होते है वो केवल चरान छपने में ही माहिर होते है पड़ने में नहीं.

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  6. प्रबंधको का टेस्ट होना ही चाहिए.अगूठा टेक प्रबंधक नहीं चाहिए.

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  7. बहुत अच्छा एसा होना ही चाहिए ,.निजी महाविद्यालय के प्रबंधक भौतिक और फिजिक्स में बहुत बड़ा अंतर मानते है ,ऐसी स्थिति है इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको की.

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  8. भाई मिश्र जी, बहुत ही नेक सुझाव है. जरूरत है शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकने की. आज एक अच्छा साधन बन चुकी है शिक्षा धन कमाने का. जबकि इसका उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना चाहिए जिससे वह समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सके. दरअसल वर्तमान अर्थ युग में अगर कहा जाय की पैसा युगधर्म बन गया है तो अतिशयोक्ति न होगी. शिक्षा देने वाले और ग्रहण करने वाले दोनों की मानसिकता इसके सहारे धन कमाने की हो गयी है. ज्ञान से कोई वास्ता नहीं. एक सर्वे के मुताबिक सबसे नौकरियों में सरकारी सेवा प्रशासन एवं पुलिस है. दूसरे सर्वे के अनुसार भारतीय समाज में लोगों की सबसे ज्यादा नौकरी की कामना इन्ही विभागों में करने की है. इसका अर्थ यह हुआ की लोग जानते हैं की गलत है फिर भी उसे पाने की इच्छा रखतें हैं. दृष्टिकोण परिवर्तन की आवशयकता है. बी डी पाण्डेय

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