Sunday, 27 July 2014

क्या आप मुष्य है

मौत मेरी हो रही है ,
रोये तुम जा रहे हो ,
दुनिया से जो जा रहा हूँ ,
पहुँचाने तुम आ रहे हो ,
दर्द की इन्तहा पा चुप ,
तुम बिलखते जा रहे हो ,
काश यही हमदर्दी दिखाते ,
तो हम दुनिया से क्यों जाते ,
जिन्दा के लिए वक्त नहीं ,
मरने पर कहा से पाते ,
सच किसे समझूँ आलोक ,
जब जिन्दा था या अब ,
मौत पर हुजूम साथ में है ,
पर अकेला जिन्दा था तब ...............
जानवरों की तरह जीने वालो से निवेदन है कि जब जिन्दा मनुष्य तुमसे सहायता की दरकार करें तो मौश्य की तरह व्यवहार कीजिये ना की जंगल के उन जानवरों के समूहों की तरह जो अपने साथी को शेर द्वारा मारे जाने को देखते रहते है और घास चरते रहते है .क्या कहने के लिए मनुष्य कहते है अपने को ..................क्षमा अगर किसी को बुरा लगे 

1 comment:

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