Friday, 9 March 2012

mahila aur bhed bhav

आज होली और होलिका की आग ठंडी हो चली है और अगर अखिल भारतीय अधिकार संगठन गलत नही है तो होलिका ( महिला ) की राख पर मुंशी प्रेम चाँद के उपन्यास कफ़न की तरह दर्द से तड़पती महिला से दूर आलू  उबाल कर कर खाने वाले पुरुषो की तरह हम भी गुझिया औत पापड़ , दालमोठ में होली के बाद का विमर्श करते है ...पता नही यह एक इतेफाक है या फिर सही कि कई समाजो में प्रुरुष के मरने पर तेरहवी १३ दिन पर होती है पर महिला के मरने पर आठ दिन पर होती है और हम होली कि समाप्ति भी आठ दिन बाद शीतला अष्टमी पर करते है ...क्या वास्तव में महिला का ही जश्न हम मानते है ?????????????????? खैर ऐसा जनजाति समाजमे होता है ........मैंने आज सोचा था कि आपसे कुछ और बात करूंगा क्योकि महिला दिवस तो बीत गया , सरकारी कामो कि तरह फिर आगले साल कुछ लिख कर वह वही लूट लूँगा पर न जाने क्यों आज फिर एक महिला का यक्ष प्रश्न मजबूर कर गया कि आपसे भी यही बात पूछ लू ...उस महिला का कहना था कि आपने शादी ने की तो आप योगी है और मैंने नही की तो मै अभागन हूँ , आपके लिए कोठे बने है , योगी भी रहिये और जब मन करे कोठे पर भी रात के अँधेरे में घूम आइये पर एक लड़की लड़के से बात भी कर ले तो पूरा समाज उपन्यास लिख देता है , उसके चरित्र का प्रमाण्पत्र देने लगता है .....लड़की क्यों नही स्वतंत्र हो सकती है लड़के की तरह हर कार्य के लिए !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! एक गाय स्वतंत्र है पर लड़की आज भी संस्कृति की लाश ढो कर यही बताती रहे कि मनुष्य ने संस्कृति कैसे बनाई? मै उनकी बात सुन कर सोच रहा था कि आज लड़की में समाज को लेकर कितनी निराशा है ...उसी समय मुझे अपनी एक सहकर्मी की याद आई जो महिला के सिंदूर लगाने की विरोधी है , उन्हें उसमे गुलाम की बदबू आती है और वह बिना सिंदूर के रहती है ....पर क्या ऐसा करना ही नारी की स्वतंत्रता है .......पर इन सब के बीच मुझे अपनी माँ भी याद आती है एक उच्चा शिक्षा प्राप्त महिला जो साथ के दशक में हॉस्टल में रह कर पढ़ती थी और शादी के समय अध्यापन में सलग्न थी पर उन्हें लगा कि मै अपने बच्चो को पालूंगी , उन्हें समाज के योग्य बनाउंगी और उन्होंने ऐसा किया भी ...पर मुझे ऐसा लगता है कि उनका नाम चारदीवारी में सिमट गया सब उन्हें मेरे पिता की पत्नी के रूप में ज्यादा जन ते है ...माँ की शिक्षा को जानने के बाद मुझे शर्म आई कि मेरी माँ को सहर में कोई नाम से नहीं जनता और बस मैंने अपनी माँ के नाम की पट्टी बनवाई और उसे घर के बहार लगवा दिया ताकि जो भी देखे यह जान सके कि महिला कौन है और उसका नाम क्या है .....क्या आपकी माँ का नाम घर के आस पास लोग जानते है ??????????????? नही तो आप भी अपनी माँ को इतना सम्मान तो दे ही सकते है ....देंगे न !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! हमारे देशमे इतना भेद भाव क्यों ???????????? जब कि भेद भाव  संविधान तक में निषिद्ध है , ऐसे भेद भाव  पर चर्चा करने के लिए अखिल भारतीय अधिकार संगठन एक दिवसिय्र संगोष्ठी २१ मार्च को जय शंकर सभा गार में ११ बजे प्रातः से आयोजित कर रहा है ....आप www.seminar2012.webs.com पर अपना  पंजीकरण कराए और सारांश १५ मार्च तक alokchnatia@airo.org.in पर भेज दे .......डॉ आलोक चांत्टिया

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