Monday, 30 January 2012

maut

क्यों महक रही हो इस कदर मेरी जिन्दगी में तुम ,
चमेली कह दूंगा तो गुनाह होगा मेरे लिए लिए ,
तुम बन कर क्यों रही पाई उस जंगली फूल सी ,
जी भी लेती जी भर कर जानवर के साथ ही सही ,
अब देखो जिसे वो ही तुम्हारे महक का प्यासा है ,
क्या अभी भी डाली से जुड़े रह जाने की आशा है ,
आज तक न जान पाई आदमी की फितरत आलोक ,
उसे हर महक , सुन्दरता को देख होती हताशा है ,
मुझे दर्द है कि तेरी मौत पर कभी कोई न रोयेगा ,
तेरी हर बर्बादी में बस संग एक कांटा भी खोएगा ..........मौत के अंधकार से निकल कर जिन्दगी आपसे कह रही है आप सभी को सूरज कि रौशनी मुबारक ...........सुप्रभात

4 comments:

  1. अच्छा लिखा है..

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  2. भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

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